दोस्तों!
“शब्द सत्ता के शिल्पी” नामक व्हाटसएप समूह में होने वाली
कविता विनिमय विवरण आपके सामने प्रस्तुत है| 21.03.2021 को “विश्व कविता दिवस” है| इस उपलक्ष्य में “कविता”
पर अलग अलग समय पर साझा की गई कविताओं की एक झलक देखिए|
डॉ हिमांशु शेखर
विश्व कविता दिवस 21.03.2021
शब्द शिल्पी: नवरत्न
प्राणेन्द्र नाथ मिश्र
प्रेरणा पारिश
अमन बिश्नोई
सुरेन्द्र प्रजापति
दीपक पाण्डेय
मीनू वर्मा
प्रिन्शु लोकेश
आशीष दीक्षित
भारती
कविता दो शब्द
कविता में ब्रह्माण्ड समाहित
ब्रह्मा की रचना, कवितामय,
वीणा झंकृत हो दिशा दिशा
कविता, सरस्वती का श्वेतालय |
कविता की व्यथा
मेरी कविता मे तुम तो नहीं,
फिर किसकी व्यथा सुनाती है ?
पलकों को झुका कर करुणा से
अस्फुट कुछ कह जाती है ।
केसर के लेप मे लिपटी हुयी
हाथों मे महावर की रचना
और अधर राग के झंकृत स्वर
का बेबस होकर के बहना।
जैसे सोलह शृंगारों की
अन्त्येष्टि क्रिया समझाती है,
पलकों को झुका कर करुणा से
अस्फुट कुछ कह जाती है।
मेरे अन्तःकरण की वृत्ति- शक्ति
पहचान न पाती, सत्य है क्या ?
करुणित स्वर मे जो कहती है
सुन पाता हूँ पर, दृश्य है क्या ?
हे कविता ! क्या तुम व्यथा मेरी
मेरे अन्तर्मन मे रहती हो,
मेरी पीड़ा को शब्द बना
मुझसे मेरा ही कहती हो।
कविता से मेरा प्रेम, क्यों ?
व्यक्तित्व मेरा बन कर निकले
जब शब्दों, छंदों, गीतों मे,
तब आता मै, कविता बन कर
स्वप्निल होकर संगीतों में..
है जितना प्रेम मुझे खुद से
उतना ही मन के भावों से,
परिचय मेरा, मेरी कविता
बहती है, ह्रदय-उद्गारों से..
कुछ संवेदक पाठक-गण में
आँखों से दिल में उतरती है,
कैसे कह दूँ मैं, प्रेम नहीं
कविता मेरी, प्रेयसि पढ़ती है. .
विश्व कविता दिवस विशेष
कविता जीवन की गाथा है
रोती है, गाती, हंसती है,
पीड़ा,उद्वेग, विराग लिए
मन की अनुभूतियां लिखती है
कविता छूती है मन से मन
अनकही व्यथा बतलाती है
मानव, मानव से जुड़ा हुआ
कविता, संदेश दे जाती है।
प्राणेन्द्र नाथ मिश्र
कविता क्या है ??
एक सृजन है
अन्तःकरण है,
यथार्थ है
कभी एक स्वप्न ,
कल्पना
कभी विवेचना,
सावन कभी
कभी है ऊष्मा,
क्रांति कभी
कभी है ये प्रश्न,
रुदन कभी
कभी एक जश्न,
कविता के कई आयाम हैं
जो देते कई पैग़ाम हैं,
जीवन के रंगों में रंगी
ज्योत है जागृति की,
मन से उठती पुकार है
संवेदना इसका आधार है,
कविता है एक रोशनी
मन की ये एक रागिनी ,
ओज , प्रेम , सत्य , अलख
इंकलाब और ललकार
कितने ही समाहित भाव हैं
कवि की सोच और विचार हैं,
हौसलों की ये उड़ान है
निराशा भरा कभी पैग़ाम है,
व्यथित हो या आंदोलित ये मन
कविता अभिव्यक्ति का हथियार है,
बदलाव का औजार है ।
कविता (साहित्य) क्या है ?
एक सृजन है
अन्तःकरण है,
यथार्थ है
कभी एक स्वप्न ,
कल्पना
कभी विवेचना,
सावन कभी
कभी है ऊष्मा,
क्रांति कभी
कभी है ये प्रश्न,
रुदन कभी
कभी एक जश्न,
कविता के कई आयाम हैं
जो देते कई पैग़ाम हैं,
जीवन के रंगों में रंगी
ज्योत है जागृति की,
मन से उठती पुकार है
संवेदना इसका आधार है,
कविता है एक रोशनी
मन की ये एक रागिनी ,
ओज , प्रेम , सत्य , अलख
इंकलाब और ललकार
कितने ही समाहित भाव हैं
कवि की सोच और विचार हैं,
हौसलों की ये उड़ान है
निराशा भरा कभी पैग़ाम है,
व्यथित हो या आंदोलित ये मन
कविता अभिव्यक्ति का हथियार है,
बदलाव का औजार है ।
कविता दिवस की शुभकामनाएं
कविताओं की धरती
कविताओं का आसमां
जाएं जहां कविताएं हों वहाँ
छुपी कितनी ही इनमें
अनकही कहानियां
खुशियाँ कभी,कभी गम की निशानियाँ
जीवन का प्रतिबिंब दिखाती हैं हमें
कितनी ही सीखें दे ये जाती हैं
हमें।
प्रेरणा पारिश
कविता अपनी बेगानी
तुम ही मेरी कविता हो तुम ही छंद
तुम ही गीत,गजल हो मेरे
शब्दों की माला में पिरोना चाहूं
तुम ही अलंकार,रस हो मेरे
तुम ह्रदय तल पर अंकित हो
जैसे कागज पर अंकित कोई मर्म हुआ
मैं तुमको ऐसे लिखना चाहूँ हूँ
जैसे परिश्रमी का कोई परिश्रम
हुआ।
वर्णों,शब्दों की तुम हो माला
और हो छंदों की तुम मधुशाला
तुझमें डूबा फिरूँ मतवाला
तुम नो रसों की लगती हो हाला
मेरे हृदय में है बस भाव भरे
मेरे कानों में है सुझाव भरे
कविता तो है कागज की दीवानी
मेरे अरमान है सारे धरे पड़े
कविता तब तक मेरी है
जब तक जिव्हा पर न आए
कविता तब कागज की हो जाती है
जब वो कलम की डोली पा जाए
हृदय से मेरे आह निकलती है
और तुम वाह समझते हो
मित्र मेरे तुम भी तो आभासी हो
मेरी कविता की भांति प्रवासी हो
हृदय में थी तब तक मेरी थी
जिव्हा पर आकर बेगानी हुई
कविता मुझको अकेला छोड़ गई
मित्र यह तो बड़ी मनमानी हुई
अमन बिश्नोई
सुंदर कविता
गुलाब काँटो में
कैसे खिलता है?
सूर्य की प्रखर किरणो में
तपकर भी-
सुगन्ध कहाँ से लाता है?
कैसे बनती है
एक सुंदर कविता
पूछो इससे
बंजर मिट्टी को तोड़ते
पसीने को जलाते
इंसान को पढ़ो
क्या तुम सुन रहे हो,
कि यह टूटते पत्थर का
रुदन है या
मिट्टी में सने
खून का चीत्कार
शब्दों में ढूंढो,
जीवन की एक मुकम्मल तस्वीर
पढ़ो, संवेदना की गूँज
समर्पण का उच्छवास
सत्य का प्रकाश
मैं कहीं भी होता हुँ
मैं कभी भी, कहीं भी होता हूँ
जिम्मेवारियों के साथ होता
हूँ
बच्चों की जरूरतें, गृहस्थी का बोझ,
चाहे जहाँ भी होता हूँ,
उत्तरदायित्वों के साथ होता
हूँ।
पसीना बहाते, खेतों में।
गीत गाते, खलिहानों में
सरिता के तट पर ,
या उदासी लिपे, रेगिस्तानों में।
आश्चर्य ये कि...वहां--
जीवन के तमाम लिपि के वावजूद
कविता नहीं
होती जैसे---
राम राज्याभिषेक के समय, सीता नहीं होती।
हाँ उस वक्त...
जब, मैं भी नहीं होता हूँ, वहाँ पर
कहीं भी नहीं,
न घर-न बाहर, गांव, न नगर
जब मैं कविता लिखता हूँ,
एक एक शब्दों से लड़ता, झगड़ता,
जीवन के अर्थ ढूंढता
कलाबाजियां करता, कभी पिटता
मैं यदा, कदा मुस्कुरा पड़ता हूँ
जब मैं कविता के शूक्ष्म तारों को
छूता
कहीं और ही होता हूँ
अक्षरों की गलबाहीं करता,
अभ्यस्त होता हूँ....
एक आदत की फितरत में दम भरता
मैं जाना चाहता हूँ...
एक ही समय में अंतरिक्ष तक, विचित्र ग्रहों पर
सागर की अनन्त गहराइयो में
ज्वालामुखी के वृहत खाइयों
में
फिर मैं अपने में लौटना हूँ
एक साथ सबमें लौटता हूँ
जैसे लाल, नीले ग्रहों से छूकर लौटती है,
जीवन की तरंग,
कई कई सम्भावनाओं के संग........
सुरेन्द्र प्रजापति
कविता की प्याली
जब जब टूटे संयम को,
शब्दों का सम्बल मिलता है।
अंतर्मन की बर्फ शिला से,
वहां पीर का मोती पिघलता है।
शब्दों की बैसाखी पर,
मचल मचल जो चलता है।
करुणा कलित व्यथा बन के,
वहां भावों का अम्बर दिखता है।
मीरा की भक्ति का सागर,
ले भजन की लहरें उठता है।
बृंदावन की गोपिन में,
वहां कान्हा का प्रेम तरसता है।
रस छंद अलंकृत करने को,
मनमीत की चाह तड़पता है।
कविता का अभिमान यही,
वो मनमीत मिलन को बसता है।।
स्याही के सम्मोहन संग,
प्रेरणा का दीपक जलता है।
आ कविता की प्याली पर,
फिर सारी उम्र सुलगता है।।
दीपक पाण्डेय
कवयित्री हूँ मैं
दिल के दर्द को मैं,
शब्दों में पिरोती हूँ,
खुशी और गम को...
रचना में अपनी संजोती हूँ,
कवयित्री हूँ मैं,
हर भाव को..…
कविता का रूप देती हूँ।
कभी प्रेम रस में काव्य..
अपनी डूबोती हूँ,
कभी कष्ट पीड़ा से उनका
परिचय करवाती हूँ,
समाज का आईना...
हर एक को.......
बेबाकी से दिखाती हुँ,
अच्छाई- बुराई से सबको...
अवगत कराती हूँ,
रचनाकार हूँ मैं,
वास्तविकता को......
आधार शब्दों का देती हूँ।
अन्याय का विरोध,
लेखनी से अपनी करती हूँ,
सच्चाई का समर्थन बार-बार...
खुलेआम करती हूँ,
अत्याचार होते देख,
सहन नहीं कर सकती हूँ,
कवयित्री हूँ मैं,
साथ हमेशा सच का देती हूँ।
देश प्रेम को दिलों में,
जगाने का हुनर रखती हूँ,
हौसले को अपनी....
हमेशा बुलंद रखती हूँ।
रचनाकार हूँ मैं,
भावना देश भक्ति की....
बेइंतेहा दिल में रखती हूँ।
हर विषय, हर समस्या पर...
तर्कपूर्ण विचार देती हूँ,
सच्चाई का तहे दिल से.. ...
सदा सम्मान करती हूँ,
भावना राष्ट्रप्रेम की ....
दिल में लेकर चलती हूँ।
कवयित्री हूँ मैं,
मन के एहसास को.....
कविता में पिरोती हूँ।
मीनू वर्मा
कविता दिवस
नयी नयी कविता मिलैं मिलैं नये
कविराज।
एक कविता के चार कवि अहो भाग्य
कृतराज।
कविता के कछु मूल नहि लुगदी बिचै
बजार।
पोथी मा कविता चढ़ी कविवर
चढे़ कपार।
प्रिन्शु लोकेश
विश्व कविता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं
कविता ना केवल कविता है
कविता जीवन का
है आधार
कविता भावों की उत्कंठा
कविता जागृति मन का है उद्गार
कविता ना केवल कविता है
कविता जीवन का
है आधार
कविता भावों की उत्कंठा
कविता जागृति मन का है उद्गार
आशीष दीक्षित
कविता केवल शब्दों की माला ही नहीं ..
कविता भाव है
अभिव्यक्ति है
अनकहे अल्फ़ाज़ो की.
पूर्ण
है ,कुछ अधूरी खवहिशो की
कविता गान है
उल्लासित हृदय का ..
कुछ छंद कुछ दोहे ...
बहुत कुछ मोती
अपनी माला में पिरोए।
रस में डूबी कविता
आखों को भिगो देती ..
विरह या उल्लास ये
तृप्त कर देती ।
महफ़िल की शान है कविता ..
लिखते जो जन तुझको, उनकों
सरस्वती का वरदान है कविता ...
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