दोस्तों!
“शब्द सत्ता के शिल्पी” नामक व्हाटसएप समूह में होने वाली
दैनिक कविता विनिमय विवरण आपके सामने प्रस्तुत है| आज “अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस”
पर साझा की गई कविताओं की एक झलक देखिए|
डॉ हिमांशु शेखर
अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस
शब्द शिल्पी गण
डॉ.
अनिता
पाण्डेय
भरत सिंह रावत
डॉ स्वाति कपूर चड्ढा
सुलेखा कुलश्रेष्ठ
मीनू वर्मा
राही राज
सुरेन्द्र प्रजापति
प्रेरणा पारिश
औरत की कहानी औरत की जुबानी
मेरी कहानी मेरी जुबानी
मैं हूँ प्रकृति तुम हो पुरुष,
मैंने जन्म देकर किया तुम्हें
पोषित।
तुम्हें हर तरह से किया संतुष्ट,
मानसिक हो या शारीरिक।
तुम्हारी जिंदगी में कभी बहार बनकर
आई,
कभी माँ के रूप में ममता लुटाई,
तो कभी बहन के रूप में बांधी कलाई,
कभी पत्नी के रूप में तुम्हारे साथ
की मिताई,
तो कभी वेश्या के रूप में तुम्हारी
सेज भी सजाई,
दादी नानी के रूप में भी दी
तुम्हें शीतलताई ।
मैं नही कहती तुम मेरा उपकार मानो,
लेकिन मेरे आस्तित्व को तो मानो,
मुझे देवी या भारत माँ का स्थान ना दो,
बराबरी का भी दर्जा नही दे सकते तो
ना दो
किन्तु मेरी ही सृजन को अभिशाप ना
दो।
अपने से कम आंकने की भूल ना करना,
यदि हमने अपनी हदे पार कर दी तो,
तो मिटा देगें नामोनिशान तुम्हारा,
सृजन किया है तुम्हारा तो विनाश
करने का भी दम भी रखते है हम॥
डॉ. अनिता पाण्डेय
बेशक महिला दिवस मनाया,आज हमारे देश ने।
किंतु मुझे झकझोर दिया है, इस गंदे परिवेष ने।।
लुटती बेटी रोक न पाया, सरकारी आदेश ने।
ज्यों भारत में डेरा डाला, दशकंधर लंकेश ने।।
शहर शहर और गली गली में, होती जब मनमानी है।
महिला दिवस मनाना तब तक, लगता इक बेमानी है।।
महिला दिवस नही हमको अब महिला वर्ष
मनाना है।
पीड़ित और शोषित बेटी को, मिलकर न्याय दिलाना है।।
बेटी को कमजोर नहीं, अब शक्तीबान बनाना है।
मातृशक्ति ही आदिशक्ति है, हमको यह समझाना है।।
जब भारत में नारी की, आंख बहाती पानी है।
महिला दिवस मनाना तब तक, लगता इक बेमानी है।।
कलम थाम कर कलमकार सब, एक परिवर्तन लाएंगे।
बेटी को लक्ष्मीबाई सी, हम पहचान दिलाएंगे।।
रावण जैसे दानव जब फांसी लटकाए
जाएंगे।
लव जेहादी अब नारी पर, नहीं निगाह उठाएंगे।।
रावत नारी पूज्यनीय है,त्यागी है, बलिदानी है।
महिला दिवस मनाना तब तक, लगता इक बेमानी है।।
भरत सिंह रावत
महिलाएं सिर्फ शक्ल ....
और ज़िस्म से ही खूबसूरत नहीं होती,,
बल्कि वो इसलिए भी खूबसूरत होती
हैं,।
क्योंकि प्यार में ठुकराने के बाद
भी ...
किसी लड़के पर तेजाब नहीं फेंकती !
उनकी वज़ह से कोई लड़का
दहेज़ में प्रताड़ित हो कर फांसी
नहीं लगाता !
वो इसलिए भी खूबरसूरत होती हैं,,
कि उनकी वजह से किसी लड़के को
रास्ता नही बदलना पड़ता!
वो राह चलते लड़को पर
अभद्र टिप्पणियां नहीं करती!
वो इसलिए भी खूबसूरत होती हैं,, कि
देर से घर आने वाले पति पर
शक नही करती,
बल्कि फ़िक्र करती है!
वो छोटी छोटी बातों पर
गुस्सा नही होती,
सामान नही पटकती,
हाथ नही उठाती,
बल्कि साथी को समझाने की,
भरपूर कोशिश करती हैं !
वो जुर्म सह कर भी
रिश्ते इसलिए निभा जाती हैं,,
क्योंकि वो अपने बूढ़े माँ बाप का
दिल नही तोड़ना चाहती !
वो हालात से समझौता
इसलिए भी कर जाती हैं,
क्योंकि उन्हें अपने बच्चों के
उज्ज्वल भविष्य की फ़िक्र होती है !
वो रिश्तों में जीना चाहती हैं !
रिश्ते निभाना चाहती हैं !
रिश्तों को अपनाना चाहती हैं!
दिलों को जीतना चाहती हैं !
प्यार पाना चाहती हैं !
प्यार देना चाहती हैं !.
हमसफ़र, हमकदम बनाना चाहती हैं।
महिला दिवस पर विशेष...
डॉ स्वाति कपूर चड्ढा
नारी की महिमा
नारी तुम अवर्णनीय हो।
हर रूप में वंदनीय हो।
मां के रूप में वात्सल्यमयी, करुणामयी, ममतामयी आगोश।
पुत्री रूप में मान प्रतिष्ठा
रक्षक, निश्छल खुशियों भरा जोश।
बहन के रूप में विशिष्ट मित्र हो
तुम तुम हो भाई की राजदार।
पत्नी रूप में प्रेम ,श्रद्धा ,त्याग, सेवा, भाव।
सहनशीलता कि तुम पराकाष्ठा हो।
हर दर्द से गुजरती तुम अपने लिए
सोचती कहां हो।
सब रिश्तो को एक धागे में पिरोने
का तुम में दम है।
नारी कर्तव्य निर्वाह के लिए
अविराम तैयार हरदम है।
हर रिश्ते को महकाती, भरती मिठास तुम अतुलनीय हो।
नारी तुम हर रूप में वंदनीय हो।
आज की नारी संपूर्ण सक्षम है।
अब नहीं करती प्रतिकूल
परिस्थितियों में अपनी आंखें नम हैं।
वैज्ञानिक उच्चासन आदि विभिन्न
पदों पर नारी का वर्चस्व है
घर तो घर अब बाहर भी उसकी सफलता का
उठता स्वर है।
सभी कार्यों को ईमानदारी, निपुणता परिश्रम से करती नारी तुम
पूज्यनीय हो।
नारी तुम हर रूप में वंदनीय हो।
नारी तुम अवर्णनीय हो।
सुलेखा कुलश्रेष्ठ
सहारा वक्त का लेकर
सहारा वक्त का लेकर....
अब तक चलती रही हूँ मैं,
बाधाओं से जूझती...
लड़ती रही हूँ मैं ।
बार-बार गिर कर..
संभलती रही हूँ मैं,
मंजिल से कोई कह दो अभी,
थकी नहीं हूँ मैं।
चल रही हूँ रास्ते पर..
अभी रुकी नहीं हूँ मैं,
लड़कर कभी खुद से,
कभी अपनों से....
अभी भी अडिग हूँ मैं।
छुपा रखी हूँ दिल में..
बहुत सारी ख्वाहिशें अभी भी,
दुश्मनों से कह दो...
अकेली नहीं हूँ मैं।
साथ अभी भी है......
अपनों के प्यार का,
मंजिल से कोई कह दो,
अभी पहुंची नहीं हूँ मैं।
परिस्थितियां कितना भी...
सितम कर ले मुझ पर,
हार नहीं मानूंगी मैं,
ठोकरें कितनी भी लगें...
उफ़ तक नहीं करूंगी मैं।
सहारा वक्त का लेकर...
अब तक चलती रही हूँ मैं,
हर विघ्न से टकराकर.....
संघर्षरत रही हूँ मैं।
मीनू वर्मा
नारी नदी सी होती है
नारी नदी सी होती है ,
गंगा की धारा सी होती है ,
बहुत ही प्यारी होती है ,
पिया की दुलारी होती है ।
नारी ,मथुरा काशी होती है ,
बृंदावन की खुशबू देती है ,
बनारस की आरती होती है ,
कृष्ण की राधा होती है ।
नारी नदी सी होती है ।
नारी मर्यादा में रहती है
प्रेम मे समर्पित होती है
ममतामयी होती है
गंगाजल सी निर्मल होती हैं ।
नारी नदी सी होती है ।
नारी की सीमा होती है
वो विचलित नहीं होती है
अगर हो जाए तो फिर
झांसी की रानी होती है ।
नारी नदी सी होती है ।
नारी नारियल के समान होती है
उपर से कठोर अंदर से मुलायम होती
है
साफ सुथरी उजज्वल रहती है
और शीतल पानी रखती है।
नारी नदी सी होती है.
राही राज
तुम सबल हो
क्यों हो बेवस, क्यों बेहाल हो
क्यों मायूस ही विलखती हो,
लज्जा वसन छीन गई , वृथा
अब कहो क्यों,मौन सिसकती हो।
तुम ममता, त्याग की महामूर्ति
विवश क्यों जीवन
जीने में,
क्यों हार चुकी अपनी बाजी
अंतर न जला, विष पीने में।
अपने अतीत के पन्नों पर
क्यों लाचार, बलहीन हो तुम,
तुम जनक सुता सुकुमारी हो
अनुराग त्याग तेजहीन हो तुम।
तोड़ो मौन का व्रत सज लो
चंडी, दुर्गा, भी नारी थी,
पद्मा, लक्ष्मी को दुनियां जाने
वो अद्भुत शौर्य की न्यारी थी।
तुम अबला बन आंखों में
नीर नहीं, नव अनल बसा ले,
कोमल, मधुरी, सरल वीणा पर
हो बलिदान का राग सजा ले।
वक्त नहीं अब, प्रेमिका बन
वासना में डुब उतरने की,
प्रिय बनो तुम महाजीवन का
अस्मिता की वाण बरसने की।
तुम सबल हो निर्माण सृष्टि का
माता बन अमृत, पिलाने वाली,
दिनकर से कुछ ऐसी प्रभा लो
जगमग धरती , हरसाने वाली।
तुम कांति बन इस दुनियां में
हिम शिखर पर जा सकती हो,
नई उर्मियाँ, कुछ नई कलाएं
ब्रह्मांड को दिखला सकती हो।
सुरेन्द्र प्रजापति
हिरणी से नयन , चंचल चितवन
घुंघराले केश , रेशम का वेश
मादक अंदाज , मोहक मुस्कान
ठहरो.....यही नहीं मेरी पहचान ,
मैं गरिमा हूँ ,मैं महिमा हूँ
मैं कर्मनिष्ठ हूँ , करूणा हूँ
त्याग हूँ मैं ,अनुराग भी हूँ
इस सृष्टि का आधार मैं हूँ ,
ममता का स्रोत ,दया की ज्योत
हूँ प्रेमपूर्ण , क्षमा हूँ मैं
पर ये मेरी कमज़ोरी नहीं
समझना इनको मज़बूरी नहीं,
तिरस्कार प्रताड़ना अत्याचार
बंद करो ये
कारोबार,
मैं ज्वाला भी, कटार भी मैं
प्रत्युत्तर औ प्रतिकार को तैयार
भी मैं।
प्रेरणा पारिश
जब सीताएं परित्यक्त ना होंगी,
जब द्रौपदियां निर्वस्त्र ना होंगी,
जब मिलेगा उनको इज्ज़त सम्मान,
रह पाएगा महिला दिवस का मान,
माएं बहनें
बहू बेटियां
भयमुक्त हो जब जी सकेंगी,
बना पाएंगी अपनी पहचान,
जब कथनी ही नहीं करनी में भी
महिलाओं का होगा उत्थान,
जागेगा उनका आत्मसम्मान,
रह पाएगा महिला दिवस का मान।
प्रेरणा पारिश
चल नारी हो जा तैयार
जीवन है जंग
मान ना हार
सब कुछ है संभव
निराशा से बच
एक नया इतिहास तू रच
तू है जननी, तू है सृष्टि
डर न अब
भींच ले मुट्ठी
अन्याय पर
कर प्रहार
खुलेगा निश्चय ही
हर बंद द्वार।
प्रेरणा पारिश
आज बता दो तुम नारी हो
यश! क्या गाऊं ? दिलाऊं
किसे अधिकार सम्मान
हर ओर द्रौपदी तड़प रही
है, लज्जित हिंदुस्तान?
लज्जा वसन को बेच, सौंप
ओ! पीड़ा में जीने वाली,
नित्य तृप्ति का वस्तु ,बन
दर्द विष को पीने वाली।
तुम घर की मर्यादा हो,
पर क्यों मर्यादित हो,
तुम करुणा विनय की मुर्ति,
पर क्यों? फिर शापित हो।
तुम घर-घर की लक्ष्मी हो
रौनक हो, हो साज सृंगार
पर हंसी मौसम में फूटता,
वेदना का, दीर्घ चीत्कार।
दयामयी तुम, क्षमामयी
हर सुख को देनेवाली हो,
मातृत्व,सतीत्व की रक्षा कर,
परिवार को खेने वाली हो।
तू अन्याय को जीने वाली,
ये तेरी बड़ी, निर्बलता है,
मायूस हो आंसू पीने वाली,
ये तेरी विवश कृपणता है।
गर आजादी की बात करें,
तो वह भी है, लेता दाम,
तुम दिव्य किरणों को देखो,
जहां न होती कभी शाम।
मांगे से अधिकार न मिलता
याद करो श्रीराम,
तब क्रुद्ध हो तरकस खींचा,
दिया समुद्र सम्मान।
आज जता दो, तुम नारी हो
जग में, सृजन करने वाली,
और रणचंडी , दुर्गा बनकर
दुष्टों का दलन करने वाली।
निज सतीत्व की रक्षा
करती सीता सुकुमारी थी
कोटि शीश उड़ा दिया
दुर्गा भी एक नारी थी
पोंछो आँसू, उठो, बढ़ो
और कौशल दिखलाओ
इस जीवित मुर्दों पर माधवी
शोधित वाण चलाओ
फूलों के मखमली सेज पर
ओ मदमस्त चिपकने वाले,
ओ सृंगार की साधक, देवी
ओ प्रेमी पागल मतवाले।
सकल देश मे अन्याय का,
हल्ला बोल उठा है
न्यायालय से मिले राहत,
कोई दला बोल उठा है
रेशमी पर्दे के पीछे से,
जब जब चीखे चीत्कार
तब तब देव तू भी देखेगा
ये मरघट सा संसार
आज सुहागिन की पीड़ा में
अंतःकरण जलता है
बहन दिखा दो अम्बर में,
अंतर में युद्ध पलता है
सुरेन्द्र प्रजापति
नारी शक्ति को सलाम
खुशकिस्मत होती वो बिंदिया
जो तेरे मस्तक सजती है,
निखर जाती है वो लाली
माँग तू जिससे भरती है,
सजकर तेरी इन आँखों में
काजल मतवाली होती है,
उस घर की आभा, रूप खिले
जिसपे दीवानी तू होती है,
तू ही तो है वो प्रेम पुष्प
जिससे आंगन महकता है,
तू है जननी, तू ही वसुधा
जिससे सृष्टि सूर्य चमकता है,
तू कर सृजन,जीवन देकर
हृदय अनंत आह्लाद भरती,
तू पाठशाला संस्कारों की
सही गलत की परख देती,
तू प्रकृति की शान नारी
क्यों दुनिया से तू डरती है!
कमज़ोर नहीं, तू है शक्ति
क्यूं अन्याय के आगे झुकती है!
हिम्मत और साहस भर ले मन
खुल के जी ले अब तू जीवन,
पहचान तेरी खुल के निखरे
दवाब में तू अब ना बिखरे,
जो डाले तुझपे कुदृष्टि
कर दे उसपे दृष्टि तिरछी,
तू शक्ति स्रोत, भवानी है
खुद ही इससे अनजानी है !!
तू है विवेक, तू बुद्धि है
मिटा डाल जो अशुद्धि है,
ओ नारी! कर खुद पे अभिमान
क्यूं झुकती है,चल सीना तान,
उत्कृष्ट कृति तू ईश्वर की
वरदान है तू परमेश्वर की,
जाग जा अब, हो जा तैयार
तू अपनी ही बन खेवनहार।
प्रेरणा पारिश
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