रविवार, 6 जून 2021

शिल्पी संवाद भाग 008

 

दोस्तों!

“शब्द सत्ता के शिल्पी” नामक व्हाटसएप समूह में होने वाली कविता विनिमय विवरण आपके सामने प्रस्तुत है| इस बार के शिल्पी संवाद में 02.06.2021 (बुधवार) को साझा की गई “आशिकी” पर कविताओं की एक झलक देखिए|

 

डॉ हिमांशु शेखर

 


विषय वस्तु: आशिकी

आज के शब्द शिल्पी


राही राज़

भरत सिंह सोलंकी

भरत सिंह रावत

आशीष दीक्षित

मीनू वर्मा

प्राणेन्द्र नाथ मिश्र

सुरेश वर्मा

सुरेन्द्र प्रजापति

सारिका अवस्थी

 

 

प्यार इसी का नाम है

कभी इनको साथ लेकर चलता था ,

आज बड़े फख्र से कहता हूं ,

 अब इनके पीछे मैं  चलता हुं ,

वक्त का तकाजा है ,

वक्त के अनुसार , अनुभव करता हूं ।

 

यह मेरी हार नहीं ,

यह मेरे सोच का नजरिया है ,

जब अहंकार टूट जाता है ,

तब यह बात समझ में आता है ।

 

यह अनुभव यूंहीं नहीं आया ,

पैतीस वर्षों की अग्नि परीक्षा है

सुख दुख का संगम है ,और

जीवन मृत्यु  का दर्शन है ।

 

अहंकार और गुरूर जब टूट जाते हैं

सोच में परिवर्तन होते हैं

तो एकाकार हो जाते हैं ,

दुजे थे , सफर से हमसफर हो जाते हैं ,

एक दूजे के लिए जीते मरते हैं ,

कहने के लिए दो जिस्म हैं

मगर एक जान हो जाते हैं ।

 

मेरा इनसे और

इनका मुझसे पहचान है ,

दोनो का समर्पण है , तो

प्यार इसी का नाम है ,

प्यार इसी का नाय है ,

यार की यही पहचान है ।

राही राज़

 

प्रीत

रही प्रीत पुनीत उपज उर में

सपने सजनी संग झूम उठे ।

रही रूह महकती ख्वाबों में

मादक नयनों को चूम उठे।

 

है भोली बड़ी सूरत उसकी

तो प्यार हुआ उतना गहरा।

ज्यों उषा में दैदीप्यमान

आलोकित सूरज का पहरा।

 

रहे नीति अनीति का होश नही

बेहोश नयन जल छलक रहा।

कदली कदराई पावस में

संग सजनी सावन बरस रहा।

 

हो आसमान सा आलम्बन

उनमुक्त पवन में उड़ जाएं।

हो डोर पतंग बने रिश्ते

बिन एक-दूजे नहीं रह पाए।

 

उनकी साँसों की सरगम भी

जीवन का अलख जगाती है।

खिलते होठों की पंखुड़ियों

जीवन श्रृंगार सजाती हैं।।

भरत सिंह सोलंकी

 

 

 

 

गज़ल

बड़ी मुश्किल से आती है, यहाँ दो जून की रोटी।

हमें कितना रुलाती है, यहाँ दो जून की रोटी।।

 

सुबह से शाम तक मेहनत,  कड़ी करना जरूरी है।

तभी सपने सजाती है, यहाँ दो जून की रोटी।।

 

किसी मजदूर से पूछो, कि क्या रोटी की कीमत है।

कहां तक जुल्म ढाती है, यहाँ दो जून की रोटी।।

 

निचोड़े अपने तन को, बाप जब दिन रात मेहनत से।

तभी औलाद खाती है, यहाँ दो जून की रोटी।।

 

अमीरी और  गरीबी में, कभी जब प्रेंम होता है।

तो रावत मुस्कुराती है, यहाँ दो जून की रोटी।।

भरत सिंह रावत भोपाल मध्यप्रदेश

 

कुछ एहसास, दिल से

  (१)

सर्दियों में खिली धूप

तपिश में ठंडी छांव

खबर होती नहीं कुछ

आता है प्यार जब दबे पांव।

(२)

ऐ दिल! ज़रा और ठहर

आएंगे वो होगी जो सहर

आहट पे भी हल्की सी

नज़र द्वार पे टिक जाती है

कितनी है लंबी रात आज

मुझे नींद भी ना आती है।

(३)

एक खूबसूरती सी छाई फिज़ाओं में

ज़िक्र को तेरा आज शाम छिड़ गया

पनप उठे दिल में कई एहसास अनकहे

हौले से हाथों पे जो तूने हाथ धर दिया।

(४)

तेरा आना ठंडी हवाओं सा

देता सुकून मुझे महकी फिज़ाओं सा

ज़िन्दगी में यूं तो बड़े रंजोग़म हैं

तेरा आना बनाता हर मौसम ख़ुशगवार मेरे सनम है

ज़िक्र भी तेरा लाता मुस्कुराहटों का आलम है

तेरा आना भुला देता हमसे हमारा हर ग़म है।

(५)

जब तक तुम्हें जाना नहीं था

प्यार क्या है पहचाना नहीं था

बहारें लेकर तुम जो आए जीवन में

हमारी ख़ुशी का ठिकाना नहीं था।

(६)

हमको ना थी ख़बर इक दिन हमारा भी ऐसा हाल होगा

किसी की चाहत में दिल यूं बेक़रार होगा

तड़पेगा पल पल किसी की इक नज़र के लिए

हमको भी किसी से कभी इतना प्यार होगा!

(७)

तसव्वुर ही तेरा काफ़ी है

चेहरे पे इक मुस्कान लाने के लिए

एक लम्हा ही काफ़ी होता है

किसी को अपना बनाने के लिए।

(८)

मेरे होंठों पे बसे हर एक गीत में तुम हो

मेरी सांसों के हर एक साज़ में तुम हो

मेरी नींदों ,मेरे एहसास में तुम हो

क्या करें दिल के इतने पास जो तुम हो।

(९)

तुम जो जीवन में आए

फूल खिले और भंवरे गाए

मंद समीर ने ख़ुशबू बिखराए,

महका गुलशन आनंदित तन मन

श्याम घन ने अमृत बरसाए

तुम जो जीवन में आए,

निराशा के गुबार अब छंटेंगे

आशा जगेगी,गम भी मिटेंगे,

नव जीवन से होगा सज्जित मन

संग तुम्हारे जब पल बीतेंगे,

तेरे आने की खुशी में

हृदय ने मधुर गीत हैं गाए,

दूर हुए सब भ्रम के साए

तुम जो जीवन में आए।।

 

एक कविता राधा कृष्ण के प्रेम को समर्पित है :

(१०)

अनिमेष तकती रही

कान्हा का राधा वेश,

पीत वसन,मोरपंख

सौंदर्य, सौम्यता का समावेश

ब्रज की पवित्र हवाओं में

घुला बंसरी का मीठा स्वर,

कान्हा ने जो छेड़ी तान

अंखियों  को मूंदकर,

सुध बुध बिसरायी राधा

नाची शर्म छोड़कर,

प्रेम के थे स्वर और

थी प्रीत की गहराई,

सब कुछ भुला के राधा

दौड़ी जो चली आई।

 

 

प्रेरणा पारिश

 

मुक्तक

तुम्हारे दिल में अपनी अब नहीं तस्वीर रख पाए

मोहब्बत की थी हमने पर मोहब्बत ना जता पाए

सुना है कि मोहब्बत पर  यकीं तुमको नहीं है पर

कशिश क्या चीज होती है कोई  उसको बता पाए

 

मुझे वो प्यार करती है मगर ना बोल पाती है

सराफत में सही फिर भी मोहहब्त यार करती है

दुनिया से वो छिपकर के मुझे वो यार तकती है

कह ना वो सही फिर भी मुझे वो प्यार करती है

 

तुम्हारे साथ में रहकर अधूरा हूं समझता हूं

हमारे नेह को तुमने ना समझा है समझता हूं

तुम्हे पाने की मैने कोशिशें सौ दफा की थी पर

मै चाहत बन नहीं पाया जानता हूं समझता हूं

 

हम नदी के दो किनारे संग हैं पर संग नही है

रास्ता है एक फिर भी  रास्ते में हम नही है

तुम समझी थी मुझे पर कह ना पाई हाल अपना

प्रेम में हम हैं मगर फिर प्रेम में अब हम नहीं है

 

तुम कहती हो बात करो एहसास मै लेकिन ना दूंगी

प्यार मुहब्बत वाला लेकिन मै मधुमास नहीं दूंगी

दिल मेरा क्या एक खिलौना जो आए खेले इसमें

तुम कहती हो कॉलेज दिन में दिल मै किसी को ना दूंगी

आशीष दीक्षित

 

श्री कृष्ण की परछाई--मीरा

तेरे प्यार में वन- वन भटकी,

मैं बनकर, एक बंजारन,

मैं तो थी......,

एक नारी अकेली।

तुम तो थे, .....

        मेरे नारायन।

 

तेरे एक दर्शन को, मैं तो

तरसती रही, सारी उमर,

तुम वृंदावन में बैठकर

रास रचते रहे,....

           गोपियों संग।

 

सारी उमर गवा दी मैंने

नाम तेरा ही जप-जप कर

पास तेरे बैठी, रही फिर भी

राधा रानी....

                हर एक पल।

 

मैं तो बंजारन हो गई

वन-वन ,तुझे ढूंढ कर।

राजभोग भी त्यागा मैंने

जब से हो गई...

                 तेरी प्रियवर।

 

मैं तो दर-दर भटकती रह गई।

अपनी सारी -सारी उमर,

फिर भी.......मेरा दर्द,

ना, जाना तुमने, ओ..

                     मेरे प्रियवर।

 

कड़वे ,-कड़वे विश को पिया मैंने,

तेरे प्यार की चाहत में,

फिर भी तुम समझ ना पाए

मेरे दिल को....

                      मेरे दिलवर।

 

मेरे प्यार की कोई परीक्षा

क्यों नहीं ली , कभी तुमने।

क्या मैं अव्वल आ जाती,

इस बात से तुम थे ...

 ‌‌                         डरे हुए।

 

क्यों तुमने समझा ना मुझे,

मैं तो प्यार में पागल थी

क्या मैं इस काबिल

भी नहीं थी,मन भर तुझे

                          देख पाती।

 

साथ में नाम, ना जुड़ा पर!

तेरे मन से अगर मैं जुड़ जाती

बचपन से चाहा था जिसे

काश!..... मैं उसकी ....

                          बन पाती।

 

मेरे प्यार के मंदिर में तुम

बैठे रहे, हर एक पल

फिर भी क्यों?

तेरे साथ हमेशा,राधा रानी

   ‌ ‌                    आए नजर।

 

मुरली की धुन पर मैं,

मगन हो झूमती रही,

हर एक पल।

फिर भी अधूरा प्यार रहा मेरा

हो ना सकी मैं..…

                       तेरी होकर।

 

कस्तूरी की चाह में, मैं तो

मृग बनकर....

भटकती रही।

जोगन बन के वन- वन भटकी,

मैं तो हिरनी....

                        बन बैठी।

 

माना तुम नारायण हो

पर....

मैं तो अबला नारी हूं।

मैं तो प्यार में तेरे लिए

जग भी अपना ....

                    बाड़ी हूं।

 

क्यों नहीं सुध ली ,कभी तुमने...

मैं भी तो......२

बेचारी थी।

तेरे प्यार में,वन वन भटकती,

मैं तो एक....

                     दुखियारी थी।

 

वृंदावन की गली- गली में,

तेरे प्यार की तृष्णा लिए

तेरी मधुर गीतों को गाते

ना जाने.....

                    कब शाम हुई।

 

फिर भी,.....

प्यार को पा ना सकी।

मैं कैसे....

                       नादान रही।

 

क्या कमी थी,पूजा में मेरी,

जो मुझे.....

कोई फल ना मिला।

सब कुछ प्यार में

त्यागा मैंने...

फिर भी मुझे क्यों...

                     तू ना मिला??"

मीनू वर्मा

 

 

 

प्रथम प्रणय-निवेदन

कुछ बिखरे से कुछ चुने हुए,

कुछ फूल कहीं पर बासी भी,

लाया हूँ अपनी झोली में,

अर्पित करता फिर एक बार,

स्वीकार करो तो अच्छा है,

स्वीकार न हो तो..

 

देना तुम फेंक उन्हें पीछे,

अपने भूले अधिकारों में,

यदि फेकोगे मेरे ऊपर,

तो फिर उपजेगा आर्द्र-पुष्प,

फिर उपजेगा अधिकार नया..

 

मैं टूटे फूटे शब्द लिए,

कुछ इस कवि के, कुछ उस कवि के,

लाया हूँ अपने छंदों में,

अर्पित करता फिर एक बार,

स्वीकार करो तो अच्छा है,

स्वीकार न होतो !!

 

रख देना अपने पास उन्हें

पैरों के पीछे रद्दी में,

यदि वापस कर दोगे मुझको,

फिर शब्द चुराकर लिख दूंगा,

फिर उपजेगा अधिकार नया..

 

कुछ भूले भले संस्मरण,

थोड़े सच थोड़े सपने हैं,

लाया हूँ अपने होंठो पर,

अस्फुट शब्दों में ख दूंगा,

यदि समझोगे तो अच्छा है,

यदि न समझे तो !!

 

हँस लेना मेरे जाने पर

कहकर उन्मादित है कोई,

यदि हंस दोगे मेरे आगे,

प्रतिदान समझ कर रख लूंगा,

स्मरण कभी फिर होगा यह,

फिर उपजेगा अधिकार नया..

 

अंतिम साँसें आते आते,

यदि कभी देखने आये तुम

उखड़ी साँसों को वहीं रोक

आँखों आँखों में पूंछूंगा,

हाँ बोलोगे तो अच्छा है,

ना बोलोगे तो !!

 

फिर लेना होगा जन्म मुझे,

फिर प्रणय-निवेदन करने को,

फिरना होगा गलियों गलियों,

फिर तुम्हे कहीं पाना होगा,

और मेरी कहानी सुनने को,

तुमको फिर आना होगा,

फिर उपजेगा अधिकार कहीं,

फिर उपजेगा अधिकार नया..

प्राणेन्द्र नाथ मिश्र

 

कैटरेक्ट और इश्क़

पंद्रह वर्ष की उम्र में हो गया ऐसा चेंज

दिल में कुछ कसमस हुई, इश्क का बढ़ गया रेंज

इश्क का बढ़ गया रेंज, नजर हर ओर ताकती

बाकी सबको छोड़, सिर्फ लड़कियां ताकती

कइयों ने तो तीर नयन के ऐसे छोड़े

बचपन के गधे, जवानी में बन गए घोड़े

तीस साल तक ताक ताक यूं बात बढ़ गई

मैल की मोटी परत, आज आंखों में चढ़ गई।

सिर्फ नही मेरा, ये हाल संसार का है

कैटरेक्ट नही , ये पर्दा, इशको प्यार का है।

प्राणेंद्र नाथ मिश्र

उस रात की खुशबू

तुम्हारी सांसों से फूटती थी

जो वो पारिजात की खुशबू।

हां मेरी मुट्ठी में महफूज है

अब भी उस रात की खुशबू।

यूं तो तुमसे बिछुड़े दोस्त

अब एक जमाना हो गया

पर अब तलक छू जाती है

तुम्हारे जज्बात की खुशबू।

दूध में घुलते बताशे की तरह

तुम घुल से जाते  थे  मुझमें

तुम्हारे वजूद में समाहित थीं

सारी कायनात  की खुशबू।

सहेज रखा है उन गुलाबों को

वो जो तुम पहली बार दिए थे

सूखी पंखुड़ियों  से  आती है

अब भी  मुलाकात की खुशबू।

खुशनुमा अहसास से बंधा हूँ

बिछुड़ हुए विश्वास से बंधा हूँ

सबको मयस्सर कहाँ होता है

ख्वाबों - ख्यालात की खुशबू

हां  भादो के भींगे मौसम थे

जब तुमसे पहली बार मिले

मेरी देह से अब भी आती हैं

बूंदें और बरसात की खुशबू।

चुप हूँ कि चुप की आवाज

दूर बहुत दूर तक जाती है

तुम्हारा पीछा नहीं छोड़ेगी

मेरे अहसासात की खुशबू।

सुरेश वर्मा

 

प्रणय स्वप्न

कमल-नयन का सुख-स्वप्न

पुष्प छू लिया, अन्तर्मन,

हर सुरों में गंध बसा है

पुलकिल होंठ अपावन।

 

जीवन का सौंदर्य दहककर

तन-मन का प्रणय, चहककर

सार जगत का प्रमुदित हो

आता मग्न सरस नभ से स्वर

 

प्रिय! ए मंगल दीप, आरती

पुष्प का निर्मल विस्तार,

चम्पा के हारों में गूंथकर

चंचल गीतों का जय-जयकार।

 

ले आओ, माधवी आमंत्रण

पत्र, वेणी का, पल्लव का

मुस्कान मोदकों से भरे हुए

स्वर्णिम गीतों के कलरव का।

सुरेन्द्र प्रजापति

 

मेरी प्रेरणा

अंधकार मे डूबे जीवन को,

लेखा कांत दिखा जाओ ।

इन टूटे ह्दय के टुकड़ों को,

एक नई दिशा दिखा जाओ ।।

 

स्नेह के चित्रो से रंजित,

नवनीत ह्दय था  मेरा ।

अब शून्य अवस्था मे लीन,

छा गया अब घोर अंधेरा ।।

 

छाए इस सूनेपन के तम मे ,

बन प्रकाश की किरण आ जाओ ।

छायी इस काली रजनी मे तुम,

अपना मुखचन्द्र दिखा जाओ ।।

 

अब शेष नही है कुछ भी और,

न ही अब कोई है अभिलाषा ।

रुक गया है समय का वेग जैसे ,

टूटती है मन की अब हर आशा ।।

 

इस करुणा कलित ह्दय मे,

बनकर प्रेरणा तुम आ जाओ ।

अब घुला ह्दय बन नीर बहा,

तुम मेरे सम्बल बन जाओ ।।

 

निर्जन सा लगता यह जीवन,

तुम मेरी प्रेरणा बन जाओ ।

क्रंदन के गूंजते इन स्वरो मे,

तुम जीवन गीत सुना जाओ ।।

सारिका अवस्थी