रविवार, 26 सितंबर 2021

शिल्पी संवाद भाग 009

 

दोस्तों!

“शब्द सत्ता के शिल्पी” नामक व्हाटसएप समूह में होने वाली दैनिक कविता विनिमय विवरण आपके सामने प्रस्तुत है| इस बार के शिल्पी संवाद में सप्ताहांत 25 और 26 सितम्बर 2021 को साझा की गई कविताओं की एक झलक देखिए|

 

डॉ हिमांशु शेखर

 

 

सप्ताहांत विशेषांक

25-26.09.2021

आज के शब्द शिल्पी

प्रेरणा पारिश, दिल्ली

राही राज, बेंगलुरु

प्राणेंद्र नाथ मिश्र, कोलकाता

डॉ हिमांशु शेखर, पुणे

बिन्दु श्रीवास्तव, सुपौल

मीनू वर्मा, नोयडा

प्रभाकर जोशी, पुणे



 

आसमां का काग़ज़ नीला

सूरज चंदा और तारे,

कितने हैं सुंदर मनमोहक

और हैं कितने प्यारे,

किसकी ये कृति है बोलो

किसने फलक पे उतारे!

विस्तृत गगन,दिनकर चमकीला

उड़ते पंछी,तितलियों का मेला

दूर कहीं  झाँके पर्वत से

खिलती सुबह,हो जाए सवेरा

चंचल नदिया, सागर गहरा

मीन, जलचरों का पहरा,

गदराए उपवन,चंचल यौवन

धूप तीखी ,बरसता सावन

सतरंगी है कूची उसकी

उकेरा रम्य सौंदर्य,

मनभावन मदमस्त खुशनुमा

आकर्षक सम्मोहक दृश्य,

भांति भांति के जीव और जंतु

ईश्वर की कृतियाँ बिन किंतु- परंतु,

रचा उसने ही संसार है

वो इनका चित्रकार है।

प्रेरणा पारिश, दिल्ली

 

दो रोटी

 

जिंदा रहना चाहता हूँ,

मगर शर्मिंदा होकर नही,

मांगता हूँ मगर इंसान से नही,

मांगता हूँ खुदा से, जो देकर वापस लेता नही l

जो देकर भी किसी से कहता नही,

देखता है औऱ चुप रहता है,

सही गलत का फैसला करता है,

उसके फैसले को इंसान टाल सकता नही l

ना ही बहस होती है,

ना ही गवाह होती है,

कोई सुनवाई नही होती है,

सिर्फ औऱ सिर्फ फैसला होता है l

 

थोड़ा समर्थन ही तो मांगता हूँ,

बस जिन्दा रहने के लिए,

नही मांगता हूँ, सोनें चांदी,

मुझे तो बस जिन्दा रहने दो l

 

जानता हूँ, ऊर्जा मेरी खत्म हो गई,

दाँत टूट गये ,रौशनी भी चली गई,

सुन नही पाता, बहरा हो गया हूँ,

चल नही पाता, गिर जाया करता हूँ l

 

अब तो बस हरि का सहारा है,

पता नही जीवन का कब किनारा है,

ज़ब सांस, इक आश जिन्दा हैं,

दो रोटी के लिए क्यों शर्मिंदा है l

 

दो रोटी, दो रोटी, दो रोटी........

 मांगता, खुदा से, मगर

जिल्ल्त नही मांगता,इंसान से,

जिल्ल्त नही मांगता, इंसान से l

राही राज, बेंगलुरु

 

 

बेटियों को भी उनका जहान दे दो

हो सके तो मुट्ठी भर आसमान दे दो।।

 

आने दो उनको भी दुनिया में

मत घोंटों गला,सांसें चंद उधार दे दो,

समझ के इंसान उन्हें भी

थोड़ा ही सही,पर प्यार दे दो।।

 

वो भी कुछ हैं कर सकती

छोटी ही सही एक आस दे दो,

उनकी भी ज़रूरत है हमें

मन को उनके ये विश्वास दे दो।।

 

पूरे करने दो ख़्वाब,भरने दो परवाज़

हौले से रख हाथ पीठ पर,

हिम्मत बँधाती बस एक आवाज़ दे दो।।

प्रेरणा पारिश, दिल्ली

 

हार कर भी मैं जीत जाता हूँ

 

हार कर भी मैं जीत जाता हूँ,

ज़ब वो मनाने आती हैं l

 

अक्सर लड़ाई होती है, प्रियतमा से,

जंग सा छिड़ जाता हैं,दोनों शत्रु बन जाते है,

प्यार कि खातिर,यार से,

जान बुझ कर हार जाता हूँ  l

 

अक्सर छेड़ देता हूँ उनको,

बात बात और बिन बात के,

सारा गुस्सा निकाल देती हैँ मुझपर,

मन हल्का कर लेती हैंl

 

फिर दबे पाँवो से वो आती हैं

मनाने मुझे,ज़ब बच्चे सो जाते है,

उस वक़्त सच कहता हूँ,

हार कर भी मैं जीत जाता हूँ l

 

बच्चे भी अचंभित हो जाते है,

ज़ब अगली सुबह हमदोनो

खिलखिलाकर बाते करते हैँ,

किसी बात पर अगर बहस छिड़ जाती हैं l

हमें अकेला पाकर वो मेरी तरफदारी करती हैं,

एक आवाज़ गूंजती हैँ कानो में ,

खामोश, कोई कुछ भी नही बोलेगा,

यह मेरा शिकार हैl

 

सच कहता हूँ,

उस वक़्त हार कर भी मैं जीत जाता हूँ,

ज़ब वो समर्थन कर देती है l

राही राज, बेंगलुरु

 

आत्ममुग्धा ऊषा से…..

 

होकर के आत्ममुग्धा, ऊषा!

क्यों अपनी छवि बिगाड़ रही,

तुम दिन को रोक नहीं सकती

फिर क्यों सूरज को आड़ रही?

 

आभास हो तुम, दिन आने का

तुम नही हो सूर्य का प्रखर रूप

तुम, तम से बाहर निकली हो

तुम नही रश्मि की नरम धूप।

 

पश्चिम की दिशा से, ऐ ऊषा!

तुम राह कभी न पाओगी,

पूरब उत्थान, पुनीत दिशा

दिखना है तो पूरब आओगी।

 

क्यों श्वेत केश बादल के, ले

लोहित रंग, धूमिल कर डाला?

क्यों किरण समझ कर लाली को

पूरे आकाश को भर डाला?

 

सम्पूर्ण नही है कोई यहां

इस बात का मन में ध्यान रखो

मत समझो तुम हो, प्रकृति पूर्ण

नियमों को समझ अभिमान रखो।

 

हर कोई सीख देता है यहां

यह ईश्वर का विद्यालय है,

मानो तो पत्थर चार हैं ये

या मानो तो देवालय है।

 

प्राणेंद्र नाथ मिश्र, कोलकाता

 

बेटियां

 

हर घर में प्यार की सौगात बेटियां,

घर को जोड़तीं वो जज्बात बेटियां।

मुस्कान की करेंगी बरसात बेटियां,

माता पिता की हैं कायनात बेटियां।

भविष्य देखिए वो खयालात बेटियां,

हर काम में दिखाएं करामात बेटियां।

शादी हुई, विदाई अब बारात बेटियां,

दो दो संभाले घर, ये बिसात बेटियां।

याद रखना सारे, सहे आघात बेटियां,

देश को भी दे रहीं औकात बेटियां।

शेखर कहे चुनौतियों की मात बेटियां,

दिन ही बनातीं वो, जो हो रात बेटियां।

 

डॉ हिमांशु शेखर, पुणे

 

मानवता

 

मानवता  से कर प्रीति

यह मानव की है  संस्कृति ।।

 

पोषण और परिवार  ;

एक पशु भी निभाते हैं ।

 

सद्ज्ञान और सद्वृती;

पशुवृति से  हटाते हैं।।

 

मानवता से  उद्देश्य  को पालो।

 पशुवृती  से  अपने को हटालो।

 

 सद्ज्ञान  के संबल से

मानवता  के कंबल से ।

 

गुण स्वभाव  को निखार ले;

जो आत्मा को समुन्नत आहार  दे।

 

हर महानता  मानवता की हीं  नाज है ।

यह मुखौटा  नही  दिल की  आवाज़  है।

 

मानवता  बेमिसाल  तंत्र है  ;

यह मानव  जोडने का मंत्र है ।

 

 यह घूमे  प्राणियों  के अक्ष में;

सदा रह समक्ष में ।

 

 पुरुषार्थ  को स्वीकार  कर;

मानवता  को अंगीकार कर ।

 

 खुद को मिटाकर  जो पाता है ;

 वही  मानवता  कहलाता है।

 

यह देता मान,शान, और ज्ञान  है।

न समझो तो गुरुर और अभिमान है ।

बिन्दु श्रीवास्तव, सुपौल

 

माँ तो ऐसी ही होती है...

हर गम....

हंस कर सह लेती है,

कष्ट देख अपने बच्चों की...

दु:खी बहुत वो होती है,

माँ तो ऐसी ही होती है।

गलतियों को सारी,

माफ़ कर अक्सर...

लगा गले से लेती है,

दरकिनार ख्वाहिशे कर अपनी...

अफसोस तक नहीं करती है,

माँ तो ऐसी ही होती है।

जीती है बच्चों के लिए,

सारे दुःख- दर्द झेल लेती है,

अपने लाडलों की खातिर...

सारे जग से लड़ लेती है,

माँ तो ऐसी ही होती है।

रात -रात भर जाग कर वो तो..

विजय नींद पर कर लेती है,

अपने  बच्चों की खातिर...

चिंता खुद की छोड़ देती है,

माँ तो ऐसी ही होती है।

हर परिस्थिति में रहकर अडिग,

ज़िन्दगी को जीना सिखाती है,

निराशा के धुंध को हटाकर...

रौशन जीवन कर देती है,

माँ तो ऐसी ही होती है।

परवाह स्वय की नहीं करती है,

हंस कर हर दर्द सह लेती है,

आंखों में आंसू बच्चों की..

देख नहीं वो सकती है,

माँ तो ऐसी ही होती है।

दुःखी देख अपने प्यारों को

बेचैन बहुत वह होती है

समाधान नहीं मिल पाने पर...

भगवान तक से लड़ लेती है,

माँ तो ऐसी ही होती है।

खुश किस्मत हैं वे बच्चे...

माँ संग जिसके होती है,

घर वो ही घर कहलाता है,

ममता की छांव जहां होती है,

माँ तो माँ ही होती है।                            

मीनू वर्मा, नोयडा

 

प्रयाग से...

 

तुमको प्रणाम, हे तीर्थराज!

मुझको संगम तो दिखलाओ,

फिर बहे वायु इन प्राणों में

मेरे मस्तक को, तो छू जाओ।

 

तेरे प्रांगण से ले आया जो

थोड़ी सी मिट्टी, बचपन में,

माथे पर उसे लगा कर मैं

विह्वल होता मन ही मन में।

 

मत कुंभ मुझे दे अमृत का

मत बुला मुझे पावन पल में

पर हे प्रयाग! दे दर्श मुझे

जब मृत्यु बंधी ही अंचल में।

 

गंगे! मेरे अवशेष कणों से

क्या तुम दूषित हो जाओगी?

इतने भारी क्या पाप मेरे

मुझे मोक्ष नहीं दे पाओगी?

 

मुट्ठी भर अस्थि - भस्म मेरा

अर्पित है, मां! स्वीकार करो,

स्नेहिल आंचल के कोने से

छूकर, मुझ पर  उपकार करो।

 

प्राणेंद्र नाथ मिश्र, कोलकाता

 

खीर

रात मुझे एक सपना आया,

एक जजमान नें खाने पऱ बुलाया,

मैं तो फूलकर कुप्पा हो गया,

प्रसन्न हो गोलगप्पा हो गया l

 

जमाने के बाद, खीर का निमंत्रण था,

मैं बहुत हीं ज्यादा प्रसन्न था,

इतने मेँ मेरी माँ आ गईं,

सारे सपनों मेँ पानी फिर गईं l

 

माँ नें कहा,उठो बेटा, कहाँ खोये हो,

शर्मा जी के यहाँ से निमंत्रण आया है,

उन्होंने  खीर खाने के लिए बुलाया है,

अब तक तो मै सपने देख रहा था,

हकीकत सुन खुश हो गया था l

 

खीर का नाम सुन,  मुंह मेँ पानी आ जाता है,

खीर देखते हीं लार टपक जाता है,

सभी साथी आज भी मुझे चिढाते थे,

खीर कहकर हीं बुलाते है ,

खीर हमें बहुत अच्छा लगता है

खीर खाने का अलग आनंद मिलता है l

 

ना मैं मांस का प्रेमी,

ना हीं मदिरा का प्रेमी

खीर का मैं बहुत ही प्रेमी हूँ,

खीर के लिए यमराज बुलाये,

खीर खाने  जा सकता हूँ l

राही राज, बेंगलुरु

 

था आर्तनाद,    अन्तर्मन से

ऋषि के भावों मे समा गया,

चिर वियोगिनी का करुण राग

स्वर की वीणा को जगा गया।

 

कुछ शब्द स्वतः ऋषि के मुख से

बन निकले श्लोक, थे छ्ंद बद्ध

जैसे    वियोग   से      मर्माहत

झंकृत वीणा,     गा   उठी   पद्य।

 

तूने  मारा   है,      आखेटक!

इस काम से मोहित पक्षी को

एक पीड़ित है, एक खंडित है

मर्माहत कर दिया क्रौंची को।

 

 

तूने बिंध्य किया है प्रकृति नियम

शापित   करता  हूँ,   तुझे  अभी,

हो जाएँ अगम ,  वन  तेरे  लिए

तेरे मन को शांति, न मिले कभी।

 

जब प्रथम श्लोक, यह छंदबद्ध

निकला   महर्षि   की   वाणी से,

वह स्वयं चकित कह उठे, "अरे!

वरदान मिला,    कल्याणी’ से।"

प्राणेन्द्र नाथ मिश्र, कोलकाता

 

आज की बारिश

नहीं आषाढ, श्रावण

बरसे कहीं भी रातदिन

नहीं बिजली की चमक

नहीं गडगडाहट

फिर भी बरसे धुंआधार

कही हवा का कम दबाव

कही  'गुलाब ' खिला

खिलते ही आंधी और बारिश

खेलने लगी धरती पर

   

प्रभाकर जोशी, पुणे

 

पकड़ कलम , क्यों छोड़ दी!!!

निडर प्रबल और प्रखर

प्रवाहमय तेरी कलम,

पकड़ कलम,क्यों छोड़ दी?

 

मनोभाव, मनोविचार,

अत्याचार, सत्ता के खिलवाड़,

दुर्व्यवहार,अनाचार,

सद्मार्ग भी,सदाचार भी,

कटु सत्य भी,रहस्य भी

उल्लास के रंग, मन की उमंग

जीने के ढंग कलम के संग,

पकड़ कलम,क्यों छोड़ दी?

 

कभी प्रेम की फुहार है

कभी तलवार की ये धार है,

संतुलन बस संतुलन

सफलता का इसकी आधार है,

ना हो निराश , ना हो उदास

बुझा ले मन की इससे प्यास

बदलाव का ये अस्त्र है

इस सा ना कोई शस्त्र है,

कलम उठा ,ना तू घबरा

लिखता तू चल लिखता तू चल

कर्मपथ पे निर्विघ्न

बढ़ता तू चल,बढ़ता तू चल

समाज को दिखा आईना

चौड़ा करके अपना सीना,

निराशा को आशा में बदल

रुका है क्यूँ ?

कलम पकड़।

प्रेरणा पारिश, दिल्ली

 

वक्त

 वक्त  को एक नाम  दे।

 जो बना  सुबह  और शाम  से।

वक्त  को पहचान कर काम करो ठानकर।

लूटाओ  मत अज्ञान  बन।

नही  तो  सजा  देगी , शैतान बन।

 

 यह तो एक योग है ।

वक्त हीं  संयोग है ।

 इसकी आराधना;

वक्त  पर करो साधना।

 

  इसपर न  वियोग कर ;

इसका सदुपयोग  कर।

वक्त  की पुकार है ।

यह आदमी की  धार है।

 

तू इसे संभाल ले।

यह कभी  न अकाल दे।

यह तो एक आग है।

वक्त  हीं  दिमाग है ।

 

 यह मानव  की  कुंजी है ।

संभाल कर रखो यह पूंजी है ।

उम्मीदों का रंग चढाए।

मानव को महा मानव बनाए

 

 

 इसको मत विरान  कर।

इससे लड़ो , बिना सीना तान कर।

यह सबों को अपनाती है।

यह सब की साथी  है ।

वक्त  से मत कर  कट्टी;

यह है दर्द  निवारक  पट्टी ।

 

  वक्त  है  एक नैया;

जिसके  तुम हो खेबैया।

  सब मिल  इनको भेंट करें ।

अपने जीवन  में  इनको सेट करें ।

 

वक्त  एक खाली  चेक;

जो श्रम रूपी कलम से लिखी  जाए।

विचार  उसकी स्याही  है;

जो उसका मूल्य  बताए।

बिन्दु श्रीवास्तव, सुपौल

 

विचित्र चर्चा

 

ज्ञान चक्षु का लोप हुआ,

इंसान पे जब प्रकोप हुआ,

बंदूक न था वो तोप हुआ,

चर्चा में केवल कोप हुआ।

 

भागा प्रकाश अंधेर हुआ,

चूहे को कहते शेर हुआ,

हो शेर पंगु बिन देर हुआ,

सब संस्कार भी ढेर हुआ।

 

जब सभा में ये उद्गार हुआ,

नूतन बदतर संसार हुआ,

अज्ञान का भी तकरार हुआ,

शब्दों का भी अब भार हुआ।

 

अज्ञान, अंधेरा, शोर हुआ,

विवाद रात से भोर हुआ,

सभा में ये पूरजोर हुआ,

सोच रहे कोई चोर हुआ।

 

पर जग में उत्तम आज हुआ,

नवल सृजन ही काज हुआ,

कविता से ना नाराज हुआ,

कलम उठा लो नाज हुआ।

 

डॉ हिमांशु शेखर, पुणे