रविवार, 16 जून 2024

शिल्पी संवाद भाग 15

  दोस्तों!

“शब्द सत्ता के शिल्पी” नामक व्हाटसएप समूह में कविता विनिमय एक अनवरत चलने वाली गतिविधि है| इसमें प्रकाशित कविताओ को ब्लॉग के रूप में प्रकाशित करने की व्यवस्था की गई है, जिसमें एक छोटे अंतराल में प्रकाशित कविताओ का संकलन किया जाता है, जो स्थान, व्यक्ति, काल विशेष पर आधारित होते है| 15 जून को मनाए जाने वाले "फादर्स डे" को ध्यान में रखते हुए, इस मंच के शिल्पियों (कवियों) ने "पिता" पर कविताए साझा की| इस कविता विनिमय की एक झलक इस पोस्ट के माध्यम से आप के सामने प्रस्तुत है| यह पोस्ट दिनांक 16 जून 2024 को प्रकाशित किया गया|

 

डॉ हिमांशु शेखर


इस अंक के सारस्वत शब्द शिल्पी 


प्रेरणा पारिश, नई दिल्ली 

सुरेश वर्मा ,सीतामढ़ी

 डॉ. शिवजी श्रीवास्तव, नोयडा 

डॉ हिमांशु शेखर, पुणे

प्राणेन्द्र नाथ मिश्र, कोलकाता 

बिन्दु श्रीवास्तव, सुपौल



पिता


वात्सल्य, ममता ,प्रेम, त्याग

माता की  ही  नहीं  थाती है

पिता की भी कोमल भावनाएँ

बच्चों  का  मन  सहलाती  हैं,

औलाद  के  जीवन  में  होता

मात पिता का उच्च स्थान है

प्यार औ 'आशीर्वाद इन जैसा

उपलब्ध कहाँ  सारे जहान है ! 

पिता सम  वटवृक्ष  घर  का

गहन   स्नेह   की   छाया  है

जीभर प्यार  अपना उसने

बच्चों  पर    छलकाया   है ,

सख़्ती में  भी  उसकी रहती

संतान की  फ़िक्रो परवाह है

आत्मनिर्भर और नेक बनें हम

इतनी होती चाह है ,

छुपा रहता मन एक कोमल

गांभीर्य   के   खोल में 

अतुलित प्रेम बसा होता है

उसके शब्द औ ' बोल में,

अपना तन मेहनत की भट्टी में

पल  पल   उसने   तपाया   है

हर सुख- आराम दिया बच्चों को

दुःख  झेल  भी   मुस्कुराया   है,

अपनी ज़रूरत, इच्छाएँ पिता की

होकर  रह  जाती गौण हैं

बच्चों को दे पाए हर सुविधा 

करता  प्रयत्न रह   मौन है,

खुशकिस्मत संतानें सर जिनके

पिता की  छत्र - छाया  है

हर मुश्किल कर देता आसां

पिता  की  ऐसी  माया  है ,

उम्र की सीढ़ियां चढ़कर जब

थक गुमसुम वो बैठ जाता है

अपनी  बेबसी पर  छुपकर

आँसू  वो   बहाता   है,

बच्चों डगमग पाँवों की तुम

लाठी झट बन  जाया  करो 

उसके   दुखते  काँधों  का

हर बोझ  तुम उठाया करो ,

हर ऋण से बड़ा इस जग में

बच्चों  होता  है  पितृऋण 

पितृसेवा- सम्मान से मिलते

पुण्य और दुआएँ  माँगे  बिन।


प्रेरणा पारिश 



बाबूजी


रात को जब बाबूजी

खाना खाने बैठे तब

उनकी थाली में सिर्फ एक

पतली-सी रोटी थी ,देखकर

धक से रह गया था कलेजा मेरा

असल में कई दिनों के फाके के बाद

आज सांझ को घर में चूल्हा जला था

हमें तो पूछ-पूछकर भूख के कहीं ज्यादा

खिलाया था मां ने,

पर बाबूजी के हिस्से में ?

बाबूजी ने मां की ओर देखा

मां की पनीली आंखें 

जमीन में धंस रही थीं 

कई बार कुछ कहने के लिए

शब्दों का सहारा कहाँ लिया जाता है

ढिबरी हाथ में लिए बाबूजी 

रसोईघर में गए थे

फिर उल्टे पांव लौटकर 

पीढ़ा पर बैठते ही थाली की रोटी को

दो बराबर हिस्से में तोड़कर

रोटी का एक हिस्सा मां के हाथ में

और एक हिस्सा अपनी थाली में

रखा था बाबूजी ने

तभी मैंने महसूस किया कि

रात के रोएं खड़े हो गए हैं

अंधेरा घुटनों में मुंह छिपाकर 

रोने लगा है ,वैसे आंसुओं की नमी

मेरी भी आंखों में मुखरित हो रही थी

पर मैं अपने ऊपर के दांतों से

निचले ओंठ को इस कदर दाब रखा था

कि आंसू पलकों के पीछे ही

जज्ब हो रहे थे।


सुरेश वर्मा



पितृ दिवस पर पिता को समर्पित  चार हाइकु-


1.

   चढ़ गया में

   झुके कंधे पिता के

   बढ़ गया मैं।

2.

    मैं तो था मिट्टी

    तुम कुम्हार सच्चे

    नमन पिता।

3.

   मोल न जाना

    जब थे साथ पिता

    अब आंसू हैं। 

4.

    राह दिखाने

    अब भी आ जाते हैं

    ख्वाबों में पिता।

     

        डॉ. शिवजी श्रीवास्तव



 पिता को कभी बूढ़ा नहीं होना चाहिए


आज भी याद हैं

पिता के वो मजबूत हाथ

जिन्हें थाम हमारे

लड़खड़ाते बचपन ने

पैर जमाना सीखा, 

वो बलिष्ठ काँधे

जिन पर चढ़कर

दशहरे के मेले में उमड़ी

भारी भीड़ के बावजूद

हम करीब से 

साफ़ साफ़ दर्शन पाए थे

माँ की प्रतिमा का, 

कितने खुशकिस्मत 

थे ना हम

कि पिता थे हमारे साथ

हमारे हर मर्ज़ की दवा

हर समस्या का समाधान

छोटी बड़ी माँगों की पूर्ति,,,

घर पर टूटे नल

बिगड़े स्विच की मरम्मत से लेकर

छज्जे पर रखा सामान उतारने

पलंग अलमारियों को

इधर उधर खिसकाने जैसे काम

उनके ही तो जिम्मे थे,,, 


ऊर्जा से भरपूर पिता के लिए

कुछ असंभव ही कहाँ था

जैक ऑफ आल ट्रेड्स कहते हम उन्हें

एक नैसर्गिक कलाकार थे वह

स्केचिंग पेंटिंग ड्रॉइंग

सब हुनर रखने वाले 

पिता की लिखावट भी

उनके स्वभाव जैसी ही थी

साफ़, सुंदर, सरल,,, 


साल दर साल बीते

हम बड़े हुए और

अपने पैरों पर खड़े भी, 

हम जीवन में आगे बढ़े

और पिता धीरे धीरे अपने

बुढ़ापे की ओर,,, 


इस गुजरते वक़्त ने

शरीर के साथ साथ

मन पर भी बढ़ती उम्र

का असर छोड़ दिया

शारीरिक दुर्बलता और व्याधियों ने

हिला दिया उनका आत्मविश्वास, 

अपने हाथों से

सबके हाथ थाम

उन्हें उनके मुकाम तक

पहुँचा देने वाले पिता अब

अकेले बाहर निकलते

घबराते हैं

पान के शौकीन वो

ढूँढने लगे हैं अब

किसी और के हाथों का सहारा

चौक वाली दुकान 

तक भी जाने के लिए,,, 

घर के टूटे नल को

बदल देना चाहकर भी

बदल नहीं पाते,

सीढियाँ चढ़ते वक़्त

फूल जाती है उनकी साँस

और निढाल हो 

छाती पकड़ बैठ जाते चुपचाप,


कितना मुश्किल होता होगा ना

समूचे घर परिवार को 

थाम कर रखनेवाले का

ख़ुद को इतना लाचार 

और बेबस स्वीकार कर पाना!! 

पर उससे भी ज्यादा कठिन है

हमारे लिए

अपने मजबूत पिता को

कमजोर होते देखना,, 


हाँ,ये समय एक दिन

आना है सबके जीवन में

मगर दुःखद होता है

और बेहद मुश्किल भी, 

अपने सशक्त पिता को

बूढ़ा ,अशक्त और

दूसरों पर निर्भर होते देखना,,, 

कुछ तो होगा

जो टूटता होगा

उनके भी अंदर

हर पल... 

हर क्षण... 

हर रोज़.... 

मगर वो कह नहीं पाते!!!


प्रेरणा पारिश 




पिता पर कुंडलियां 


पिता जन्म फिर से हुआ, पुत्र उसी का रूप।

पुत्र पिता सम हो गया, वो खिलता बन धूप।।

वो खिलता बन धूप, राम ने यही सिखाया।

मर्यादा का शीर्ष, पुरूषोत्तम बन आया।।

कह शेखर बन पुत्र, पिता का पितृ आदर से।

वर्ड्सवर्थ की बात, जन्म हुआ पिता फिर से।।


पिता हुआ अपवाद हैं, पुत्र करें विध्वंस।

आत्याचारी बन गए, जैसे रावण, कंस।।

जैसे रावण कंस, गलत संगत का साया।

बल का हुआ घमंड, गैरों की लगती माया।।

कह शेखर जब पुत्र, कीच जड़ में सरिता है।

आततायी मरता, हुआ अपवाद पिता हैं।।


नाम पुत्र का हो तभी, पिता सरीखा जान।

अभिमन्यु व घटोत्कच, अर्जुन भीम समान।।

अर्जुन भीम समान, महाभारत के नायक।

शौर्य, वीरता, तेज, दिखते पाण्डव सहायक।।

कह शेखर हर वीर, पिता का नाम अभी हो।

पदचिन्हों पर चले, पुत्र का नाम तभी हो।।


मान पिता की बात को, भोगा था वनवास।

परशुराम की माॅं मरी, फले पिता विश्वास।।

फले पिता विश्वास, भले कठिनाई आए।

आज्ञाकारी पुत्र, श्रवण बन जग महकाए।।

शेखर अष्टावक्र, बनें शापित सुचिता की।

नहीं सहारा लिए, बात को मान पिता की।।


पिता जन्म देता मगर, संस्कार संज्ञान।

आ सकता जब चाहता, पुत्र उसे ले ठान।।

पुत्र उसे ले ठान, पकड़ तर्जनी पिता की।

तब तक पकड़े पिता, जले जब राख चिता की।।

कह शेखर मत पुत्र, विरासत उनकी लेता।

है स्वतंत्र हर पुत्र, मगर जन्म पिता देता।।


डॉ हिमांशु शेखर



जब पिता बना मैं


मैंने कन्या रूप धरा है कभी 

कभी  पुत्र रूप मे आया हूँ 

मेरा पुरुषार्थ  हुआ  सार्थक 

मैं एक पिता बन पाया हूँ।


जिस दिन से पिता मैं बना यहाँ 

मेरी अभिलाषाएं बदल गयीं 

नन्हीं संतान को गोद लिए 

मन की इच्छाएं मचल गईं। 


मन कहने लगा, मैं परम पिता 

मेरी आत्मा है मेरी बाहों मे 

मेरे आश्रम मे आई है यह 

मैं विष्णु हूँ, इसकी निगाहों में। 


अपने पुरुषार्थ मे तब पाया 

मैंने  पालनहार की बागडोर

हो गया वयस्क मैं अकस्मात 

छू लिया अनंत का वृहत छोर। 


मिल गई परिश्रम की ऊर्जा 

एक दिशा मिली, संतान नाम 

मैं हुआ अलंकृत, गर्वित हो 

और बना स्वयं मैं, पितृधाम। 


श्रम और बढ़ गया है मेरा 

संतान की इच्छा, देखभाल 

मुझे अपने पिता याद आए 

और उनका गर्वित, वह कपाल। 


यदि पूछे कोई, इस पृथ्वी का 

है श्रेष्ठ श्रमिक, बोलो तो कौन? 

तब पिता का मुख दिखला देना 

जो चिर परिश्रमी, फिर भी मौन 


एक पिता के श्रम का दाम क्या है 

कभी पूछो पिता से जाकर के 

वह कहेगा, बस संतान मेरी 

सुख पाए उन्नति पाकर के। 


संतान के सुख की आशा मे 

एक पिता मिटा देता खुद को 

तन मन को समर्पित कर देता 

कर देता दमन इच्छाओं को 


हो हाड़ कंपकंपाती ठंडक 

या धधक रही गरमी की हवा 

एक पिता काम करता रहता 

मन मे संतान के लिए दुआ। 


यह पिता का पद कुछ ऐसा है 

संतान के लिए श्रेष्ठ  आश्रय

कंधे पे बिठा  के दिखाता है

संतान को सपने सह्य या असह्य 


माना कि प्रथम  गुरु माता है  

घर आँगन के संबंधों में 

पर बाह्य जगत का गुरु, पिता 

जीवन अगणित संघर्षों मे 


“संतान सुरक्षित रहे सदा - 

चाहे जले सामने मेरी चिता 

परिचय मेरा, संतान से हो”

यह सोच लिए, चलता है पिता 


प्राणेन्द्र नाथ मिश्र



फादर्स डे

अंग्रेजों का फादर्स डे है,
भारत आज मनाता है,
दिल से सब अंग्रेज बने हैं,
आयोजन समझाता है।
भारत में फादर मत कहना,
नहीं ये पाया जाता है,
हर दिन हो, सत्कार पिता का
भारत यही सिखाता है।
भारत में जीवन भर मानव,
रिश्ते सभी निभाता है,
आबंटित हो दिवस एक ये
कम बतलाया जाता है।
याद रखेंगे सदा उन्हें हम,
जिनसे रिश्ता-नाता है,
फादर, मदर, अंकल, आंटी,
डे में ना बॅंध पाता है।
पर्व और त्योहार, दिवस
माहौल बनाया जाता है,
उसकी सारी कथा और
इतिहास बताया जाता है।
लोक पर्व और धर्म पर्व
जैसा ही दिन ले आता है,
लगता है पाश्चात्य हमारे,
संस्कार खा जाता है।
गूगल, आर्चिज करें नियंत्रित,
ऐसा दिन दिखलाता है,
कमजोरी का ही भारत में
दिवस मनाया जाता है।
फादर हो कमजोर भले पर,
भारत ऐसा कह जाता है,
हर संतान पिता के कारण,
ही पहचाना जाता है।
फादर का अनुवाद पिता है,
गलत बताया जाता है,
फादर को दिन एक, पिता को
हर दिन पूजा जाता है।
यही गुजारिश करता शेखर,
पिता सतत रह जाता है,
भारत में तो हर दिन सबका,
फादर्स डे बन जाता है।


डॉ हिमांशु शेखर 



मेरी अभिलाषा


नहीं चाह मैं पिता बनूं, अपनी संतति पर हर्षाऊं,

साथ मेरा दे जीवन भर, वृद्धाश्रम से बचता जाऊं।

फौज बनाकर, लट्ठ उठाकर, नहीं गर्व करता जाऊं,

हर देयाद से जायदाद के, झंझट सारे सुलझाऊं।


चाह नहीं मैं पुत्रवान बन, पौरूषता का गुण गाऊं,

संस्कार अंतिम पा उससे, सीधे स्वर्ग चला जाऊं।

नहीं चाह पुत्री की जिससे, मैं भावुकता पा जाऊं,

अश्रु-स्वेद, मर्यादा सीखूं, या उसमें भरता जाऊं।


मुझे भाव देना हे ईश्वर! परोपकार करता जाऊं।

अगली पीढ़ी बने सुशिक्षित, कर्म वही करता जाऊं।

कुटुंबकम् वसुधैव राग के, गीत सदा गाता जाऊं, 

पिता बनूं ये नहीं जरूरी, मित्र सबों का कहलाऊं।


डॉ हिमांशु शेखर



पिता के वचन


चंद्रमा की शीतल छाया में

माँ का आंचल, दूधिया रंग

मां दूध भात ले  आती  है

सो जाता  हूं  मैं  संग  संग


पर पिता का तब स्पर्श, उष्ण 

लेकर  के  सवेरा  आता  है

जीवन सुख दुख है, स्वेद,क्रांति 

जीने के नियम बताता है।


"एक सांस पा के जीने के लिए

तुम्हें सांस खींचना ही होगा

तुम वृक्ष हो, कोई पुष्प नहीं 

तुम्हें स्वयं सींचना ही होगा।


यह प्रकृति, पुरुष की वनिता है

सामर्थ्य रखो, एक पिता बनो

पल्लवित, प्रफुल्लित होए प्रकृति

परिवार - पुरुष - संहिता  बनो।"


प्राणेंद्र नाथ मिश्र



मिडिल क्लास पापा


कैसे भूलूं _

पापा के उस उछाल और 

अपनी इतराती किल्लोल को;


क्या मम्मी ने मारा है,

उस दूलराती बोल को;


ताता थैय्या करा, अंगुली पकड़ ;

दिखाते थे मोड़।


फिर अकेले छोड़ ;

लगवाते थे दौड़।


सारे दिन की जद्दोजहद और थकान;

टूटती वदन पे--मुझे देख 

बिखरती  थी ---मिठी मुस्कान


खुद की टूटी चप्पल में;

मुझे स्कूल की बूट दिलाना।


फटी शर्ट उनकी थी; 

पर मेरे लिए ---स्कूल ड्रेस ले आना।


खुद भूखे रहकर भी ;

मेरे लिए बिस्किट , मिठाईयां लाना।


वह पापा हैं --जो शहर में;

राजा बेटा बना मुझे घुमाते।


इक-इक प्रश्न पर ----

प्यार से परिचय करा--घर लाते।


स्कूल से आना--

पापा का इंतजार में बिताना ;


फिर स्वागत होती ----भरी थाली से।

पर रात में --

डांट सुनवाई दूध की प्याली ने।


मां की ख्वाहिशो पर डांटना,

फिर मुस्कुराना;


हमसब को भेज -- फिर मां को मनवाना।

खुद --बिन चाय पिय निकल जाना।


मैं होता (होती) अमूल्य सम्पत्ति;

पापा उसके रखवाले।


गाड़ी गन्तव्य की रकम न होती; 

तो पैरों में पड़वाते छाले।


कैसे भूलूं --सूखी रोटी खा, 

बिजनेस बढ़ाव के अकथ प्रयास;

मेरा  बिमार पड़ जाना अनायास ।


ढूंढने पर भी घर में --

फूटी कौड़ी न पाना।


फ़िर क़र्ज़ ले--

दिन -रात मुझमें समय लगाना।


हर वक्त बच्चों का--

शौख, सुकुन, चैन,संबल, विश्वास बन


तप्ती गर्मी, और कड़ाके की कूहड़े,

आंधी, तूफान में --

अपने को अडिग रख पाना।


एक अभिलाषा एक था सुख;

बच्चे मेरे बने नेक----मेरे होते

न हो इनको कोई दूख:


संघर्ष की साईकिल खींच- खींच

बच्चों को उंची उड़ान उड़ाना


मेरे पापा

प्रेम, पंख, पहिया , आसमान;

मैं तो सिर्फ सफलता हूंउ,

पापा हीं हैं पूरे यान।


बिन्दु श्रीवास्तव



2 टिप्‍पणियां:

  1. पिता पर लिखित सभी कविताएँ उत्कृष्ट हैं । वैसे तो रोज़ किसी न किसी कारण वश स्वर्गीय पिता की याद आ ही जाती है, जिनको इस संसार से गये हुए १० वर्ष हो गये लेकिन उनकी कमी हमेशा अखरती है

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    1. यही नियति है। पिता समर्थ बनाते हैं और फिर पिता बनाकर खुद विलुप्त हो जातें हैं। पिता जीवन और कविताओं दोनों के लिए एक सार्थक, मार्मिक और व्यापक विषय है। ब्लॉग पढ़ने और टिप्पणी देने के लिए आपका हार्दिक आभार।

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