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“शब्द सत्ता के शिल्पी” नामक व्हाटसएप समूह में कविता विनिमय एक अनवरत चलने वाली गतिविधि है| इसमें प्रकाशित कविताओ को ब्लॉग के रूप में प्रकाशित करने की व्यवस्था की गई है, जिसमें एक छोटे अंतराल में प्रकाशित कविताओ का संकलन किया जाता है, जो स्थान, व्यक्ति, काल विशेष पर आधारित होते है| 21 जून को मनाए जाने वाले "अंतरराष्ट्रीय योग दिवस" को ध्यान में रखते हुए, इस मंच के शिल्पियों (कवियों) ने "योग" पर कविताए साझा की| इस कविता विनिमय की एक झलक इस पोस्ट के माध्यम से आप के सामने प्रस्तुत है| यह पोस्ट दिनांक 22 जून 2024 को प्रकाशित किया गया|
डॉ हिमांशु शेखर
इस अंक के सारस्वत शब्द शिल्पी
प्रेरणा पारिश, नई दिल्ली
ई. आशुतोष कुमार, दिल्ली
डॉ हिमांशु शेखर, पुणे
प्राणेन्द्र नाथ मिश्र, कोलकाता
योग
सौम्य मुद्रा,सचेतन श्वास का संयोजन
योग से क्षमताओं का होता नियोजन ,
मिलती इससे कंचन काया
होती दूर तनाव की छाया ,
भौतिक का अध्यात्म से मिलन है
योग विचारों में लाए संतुलन है ,
मन ,शरीर, प्रकृति से सामंजस्य
ध्यान से होती सोच भी शस्य ,
वृद्धा में अनुभव हो यौवन
स्वस्थ,सुंदर,निरोग हो जीवन,
चित्त की वृतियों का निरोध हो
जीवन में सबके बसा जो योग हो,
जनक योग का भारत महान
सर झुकाता सारा जहान,
आत्मनियंत्रण,आत्मस्वीकृति
बेहतर एकाग्रता ,सहनशक्ति
योग करने के लाभ हजार
योग अपनाये सारा संसार।
प्रेरणा पारिश
योग है
चित्त की वृत्तियों का निरोध योग है,
चित्त की एकाग्रता, से फलित योग है।
नियंत्रित तन हुआ, समाधि ही योग है,
मोक्ष मार्ग अनुसरण, से अलग न योग है।
पार संसार के जो, ले चले वो योग है,
आध्यात्म से जोड़ का, नाम योग है।
प्रकृति पुरुष का, पार्थक्य योग है,
जीव ब्रह्म का मिलन, भी बना योग है।
द्वंद में भी एक भाव हो, वही तो योग है,
देख निष्काम कर्म, भाव ही तो योग है।
आठ भाग में बॅंटा, ये अष्टांग योग है,
अंतरंग, ध्यान, धारणा, समाधि योग है।
यम, नियम, आसन, बहिरंग योग है,
प्राणायाम, प्रत्याहार, का चलन भी योग हैं।
शिवसंहिता में चार, किस्मों में योग है,
मंत्र, राज, लय, हठ, ये सभी भी योग हैं।
जीव-जंतु, पेड़ की हर कला में योग है,
कर्म, मर्म, धर्म, शर्म, सब का मूल योग है।
राग, द्वेष, क्रोध, मोह, का शमन भी योग हैं,
आमरण जीवन घिरा, जिस तंत्र से वो योग है।
डॉ हिमांशु शेखर
योग, यानि चैतन्यता
व्यक्तिगत चेतना विस्तृत हो
चेतना - सृष्टि से जुड़ता जब
मन और शरीर का सामंजस्य
अदभुत औ अलौकिक होता तब
तब मन, इंद्रिय हर्षित होता
आध्यात्म डोर बंध जाती है,,,
यह क्रिया योग कहलाती है,,
विज्ञान वृहत से, सूक्ष्म रूप
बन कर जब ज्ञान सिखाता है
इंद्रियों को लेकर, मन चंचल
शासित, केंद्रित हो जाता है।
तब प्रकृति और मानव के बीच
ऊर्जा विकसित हो जाती है,,,
यह क्रिया योग कहलाती है,,
विज्ञान, कला जब एक संग
मिल, स्वास्थ्य दिशा दिखलाती है
तब जीवन होता अनुशासित
जीने की वजह मिल जाती है।
अभिव्यक्ति क्वांटम फॉर्मेट की
ब्रह्मांड में एक, जताती है
यह समझ योग कहलाती है,,,
पशु पक्षी की तन्यता सरल
और मुद्रा ध्यान की संधि प्रबल
जुड़ जाती मानव में मिलकर
करती शरीर को सक्षम सबल
जब योगासन की कई क्रिया
जन गण को निरोगी बनाती है,,
तब क्रिया योग कहलाती है,,
जब शवआसन से उठ कर के
प्राणी करता है, नौलि क्रिया
जग उठते अंग के, अंत्र तंत्र
स्फूर्ति, प्रज्वलित करती दिया
गोमुख आसन, आसन भुजंग
और कपालभाति करवाती है
वह क्रिया योग कहलाती है।
आत्मा शरीर और मन के लिए
जितनी भी क्रियाएं संभव हैं
जो हर्षित कर दें जीवन को
वे सब ही योग के अनुभव हैं
है योग प्रकृति उर्ध्वगामी
तन मन को स्वस्थ बनाती है
यह क्रिया योग कहलाती है।
प्राणेंद्र नाथ मिश्र
योग दिवस पर एक हास्य
योग दिवस की है तैयारी
है पार्क में भीड़ अब भारी
योगगुरु आसन सिखलाते
कभी हाथ ऊपर
कभी पैर ऊपर
इसको ही आसन बतलाते
कभी साँस खिंचो
कभी साँस रोको
कभी साँस छोड़ो
इसको प्राणायाम बतलाते
सब मिलकर फोटो खिंचवाते
डीपी बदलकर यह बतलाते
मैं योगी हूँ, यह सब को बताते
अगले दिन फिर सब भूल जाते
यूँ हीं हम सब योगदिवस मनाते
ई. आशुतोष कुमार
योग यज्ञ
योग यज्ञ यदि याद कर, आहुति करें पुकार।
रोग, शोक अवसाद को, इसमें डालो सार।।
व्युत्पत्ति वरदान वही, है समाधि संयोग।
संयम सरिता सारथी, योगी लगते लोग।।
भारत भूमि पुकारती, योग युक्त जग जान।
रोग मुक्ति दे दिव्य दिन, अजर अमर अवदान।।
योग दिवस दैनिक बने, ये सजीव संज्ञान।
पल पल पोषक पालते, पग पग पर पहचान।।
यम, नियम, आसन लिए, प्राणायाम पुकार।
बॅंधा बहिरंग योग में, शामिल प्रत्याहार।।
ध्यान, धारणा, धारते, सरल समाधि सहर्ष।
अंतरंग इस योग से, उपजेगा उत्कर्ष।।
डॉ हिमांशु शेखर
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