मंगलवार, 20 अक्टूबर 2020

शिल्पी संवाद भाग 002

दोस्तों!

 

“शब्द सत्ता” के शिल्पी नामक व्हाटसएप समूह में होने वाली दैनिक कविता विनिमय विवरण आपके सामने प्रस्तुत है| आज दिनांक 20.10.2020 की एक झलक देखिए|

 

डॉ हिमांशु शेखर


 

इस अंक का शब्द शिल्पी क्रम

 

सतीश चन्द्र भगत

मीनू वर्मा

सुरेश वर्मा

मीनू वर्मा।

बिंदु श्रीवास्तव

राकेश वर्मा

दीपक चौरसिया

प्राणेन्द्र नाथ मिश्र

प्रेरणा

मीनू वर्मा

नैमिष त्रिवेदी

राकेश वर्मा

प्रेरणा

प्राणेन्द्र नाथ मिश्र

 

 

झूम  रही

जगमग दीप प्रज्ज्वलित हुई

विहंस-विहंस रौशनी बिखरी

हुई सुहागिन धरती निखड़ी

है दीपमालिका  झूम   रही |

 

झिलमिल तारों ने भी बिखरी

अम्बर से ही  छन-छन बून्दी

छमछम  कर धरती पर उतरी

है भगजोगनी  घूम   रही   |

 

गलबाहियाँ दे छम छमा  छम

नाच रही दीपों की रौशनी

बाला, लज्जा त्याग किशोरियां

पीकर शरद शहद  झूम रही  |

सतीश चन्द्र भगत

 

ढूंढो उसे

दुनिया में सब बुरे नहीं हैं।

कुछ अच्छे भी हैं

कड़बे सारे बोल नहीं है,

कुछ मीठे भी है।

झूठों की यहां भीड़ अधिक है,

पर कुछ सच्चे है।

बेगानो की इस दुनिया में,

कुछ अपने भी हैं।

रातों के अंधेरों में भी,

चांद की रौशनी है।

पुरानी कल -कथाओं में भी

कुछ तो नयापन है।

नदियों के कल -कल में भी,

एक मधुरता है।

बहते हुए पवनो में भी

एक सरसता है।

लोगों की कटुता में भी

थोड़ी सी मधुरता है।

दुनिया में सब बुरे नहीं हैं,

कुछ अच्छे भी है।

मृत्यु अगर यहां  है,

तो जन्म यहीं पर है,

झूठों के भीड़ो में भी,

कुछ तो सच्चे हैं।

अंधकार भरे जीवन में भी

प्रकाश की किरणें हैं।

रोते हुए चेहरों के पीछे

छिपी मुस्कान भी है।

निराशा के बादल में भी

आशाओं की बूंदे हैं।

दुनिया में सब बुरे नहीं है,

कुछ अच्छे भी हैं।                

मीनू वर्मा

 

जिंदगी

अपने अच्छे दिनों में

तुम्हारा खूब साथ दिया है मैनें

मेरे दुखी दिनों में

तुम भी साथ

निभा देना जिंदगी ।

किसी तीखे ढलान से जब

मेरे पैर उखड़ने लगे

तब मेरी तरफ अपना हाथ तुम

बढ़ा देना जिंदगी

जैसे सीपी छुपाकर रखती है

अपनी छाती में मोती के दाने ,

विश्वास की कुछ बूंदें

मेरे भीतर भी तुम

बचा देना जिंदगी।

आंधी आमादा है

मुझें जड़ से

उखाड़ फेंकने को

इन शातिर आंधियों से तुम मुझें

बचा देना जिंदगी

बहुत याद आता मुझे आजकल

अपना गांव,गांव की गलियां

धान के खेत,

खेतों की पगडंडिया

आम-अमरूद

जामुन-लीची

बरगद-पाकड़ के वे पुराने पेड़ ,

नदी किनारे वाला

पीपल का वो विशालकाय वृक्ष

जिसकी  एक डाल में बाबूजी के

श्राद्ध से सबंधित मिट्टी का घंट टंगा था, और पूरे सात दिनों तक

भैया रोज सुबह  नदी में नहाकर उस घंट में पानी डाला करते थे ।

ताकि पिता प्यासे न रह जाये ।

मरने से पहले

इन सबके दर्शन

मुझे फिर से

करा देना जिंदगी ।

सुरेश वर्मा

 

फिर बीता कल चाहिए

 "वापस बीता कल ‌ चाहिए

साथ नहीं..... प्यार  चाहिए                

फिर से वही विश्वास चाहिए

खुशियां पहली वाली चाहिए

सुकून, दिल का वही चाहिए

आने वाला नहीं, मुझे अपना,                   बीता  कल चाहिए।

 

अंधेरों  से भरीरात   नहीं

मुझे तारों बाली रात चाहिए...

दिन  का  उजाला ना   सही

मुझे चांदनी का साथ चाहिए।

आने वाली नहीं, मुझे अपना

बीता कल चाहिए।

 

फिर से जीवन  वही चाहिए

जोश भरा वही सफर चाहिए

साथी  वही  पुराने   चाहिए

साथ    वही  सुहाना  चाहिए

आने वाली नहीं मुझे अपना,

बीता कल चाहिए।

 

विश्वास भरी वही सोच चाहिए

सपनों की वही उड़ान चाहिए।

ख्वाब आंखों में  पुराने चाहिए

हौसला फिर वही, बीता चाहिए

 एक बार  फिर से, मुझे अपना......

बीता कल चाहिए।"

मीनू वर्मा।

 ‌

कलम

खुला हुआ है द्वार कलम का;

आगे कलम बढाए ।

सजाये साहित्यकारों की संवेदना सरस्वती ऐसा शुरूर बनाए ।

तीनों काल में तिरस्कृत नही;

यह तम् में तेज दिखाती है ।

तेरा-मेरा  कुछ नहीं ;

सिर्फ अपनी पहचान बताती है ।

हे कलम तू बिन  किलकारी;

कागज  का कोख भर जाती हो;

तेरी संतान शालीन और जवान;

जो जगकर ले  --

उन्हें हरा-भरा   कर जाती है ।

कलम कुंजी है, कलम पूंजी है ।यह पंक से पंकज बनाती है  ।

हे कलम  तू कितनी निराली,

तेरे द्वार  से श्री भी चलकर आती है ।

यह तार है  तबाही  नही,

संस्कार है हारी नही ।

कलम  अपनी प्रहार से,

निपट को भी तार दे ।

सजे संसार बने गंगा;

निपट नहाए,न हो कोई  नंगा ।

बिंदु श्रीवास्तव

 

 

कैसे कैसे सपने देखे थे आज की शाम के

कैसे जोड़ लिया था तेरे नाम को अपने नाम से

कितनी प्लानिंग भी हो गयी थी उधर जाने की

वक़्त और घड़ियां भी तय हो गयी थी एक दूसरे के आने की

जब से ये खयाल आया पेट मे गुदगुदी सी थी

हर बार याद कर चेहरे पर हल्की हल्की हंसी भी थी

मैंने भी तय कर लिया था कैसे और कब तक पहुँच जाना है

साथ ही निश्चित हो गया आपको कब और कहाँ से आना है

 

उसी बीच ऐसा कुछ हो जाता है

सारी योजना का मानो कत्ल सा हो जाता है

 

आज शाम से बर्बरस येही खयाल आया रहा

सब कुछ वैसे ही चलता तो इस समय हम मिल रहे होते

एक दूसरे को देख मुस्कुराते हुए दिल खिल रहे होते

बस इसी कल्पना मैं सारी शाम गुजर गई

सपना सच न हो सका सपनो की माला बिखर गई

राकेश वर्मा

 

मोहपाश और प्रेम

कठिन है भेद करना

मोह और प्रेम में

क्या है मोह और प्रेम

लगते हैं एक सम

पर निश्चित ही,

मोह है स्वार्थ सहित

और प्रेम स्वार्थ रहित

मोह करती है इच्छाएं जागृत

और फैलाए रहती है हाथ,

प्रेम तैयार है सबकुछ त्यागने को

बस चाहता है हृदय और आत्मीयता का साथ।

मोह है विष समान,

तो प्रेम है सुधा पान।

स्वार्थ है मोह की पराकाष्ठा

और प्रेम असीम।

मोह है आकांक्षा आकर्षण की,

तो प्रेम है भावना समर्पण की।

प्रेम करता है स्वंतत्र

और मोह है पाश,

इस मोहपाश में जकड़ा हुआ हूं,

मैं, तुम और वो।

तो कौन है प्रेमी?

दीपक चौरसिया

 

 

 

एक ग़ज़ल

ये नमी आँखों की है, मत अश्क  इसको बोलिये

वह ज़रा सा रो लिए  और हम ज़रा सा रो लिए ।

 

वक़्त थोड़ा सा मिला था, क्या कहें और क्या सुने,

उनकी हालत भी वही थी, हम जो अपनी थी लिए ।

 

कुछ बिखरते फूल ही चुनना हमारा काम था,

साथ मे काँटे पड़े थे, संग अपने हो लिये।

 

ख्वाहिशों के शहर मे थे, मेरे जैसे और भी

खुद को तो समझा लिया, पर उनके ग़म मे रो लिए ।

 

आसमाँ के जिस्म मे, बिखरेंगे मोती और भी

आँसुओं के दरमियाँ, जज़्बात  अपने धो लिए ।

प्राणेन्द्र नाथ मिश्र

 

क्या है प्रेम

मंदिर में बजती घंटी सा

दीपक की उज्जवल ज्योति सा,

सागर में छुपे एक मोती सा

इसमें है कशिश, समर्पण है,

दिल का धवल ये दर्पण है

शुद्ध,मधुर एहसास भरा

कोई भी ना शक इसमें ज़रा,

विश्वास की नींव पर है ये खड़ा

तपस्या,स्नेह से हरा भरा,

कुछ लेना ना ये जाने है

 बस मन को ही पहचाने है,

अनुराग है इसमें भावना असंख्य

गिन ना सकें इतने हैं रंग,

ये तो बस इक पूजा है

इसका कोई अर्थ ना दूजा है।।

प्रेरणा

 

सूरज की पहली किरण

सुबह-सुबह......

 सूरज की पहली किरण

जब रोशनी लेकर आती है

 अपने स्पर्श मात्र से

मन पुलकित कर जाती है

घनघोर अंधेरा छट जाने का

प्रथम एहसास दिलाती है।

सुबह- सुबह तितलियों को भी,

फूलों से  मिलवाती है।

अपनी पहली किरण के साथ

चिड़ियों को चहकाती है।

 उठो अब कर्म करो अपना

सबको समझाने आती है।

 

सुबह- सुबह .…............

  सूरज की किरण जब

रोशनी लेकर आती है।

   ‌‌    अंधकार के बाद प्रकाश है आना

यह निश्चित करने आती है।

‍   असफलता के बाद सफलता है आती

इस बात को बताने आती है।

हार  है ,जीत की पहली सीढ़ी

इस बात को सिद्ध करने आती हैं।

 कठिनाइयों से लड़ना है, अब

सबको समझाने आती है।

सोना नहीं अब जागना है सबको

इसलिए उठाने आती है।"

मीनू वर्मा

 

 एक गजल

स्वार्थ  को तुम  ,बचाते  फिर रहे हो!

जो किया तुमने ,वही तो भर रहे हो!

 

मनुष्य  कितना विषम होता  जा  रहा है,

खुद के लिए वह जख्म होता जा रहा है।

आ   रही   चारो   तरफ   से   आपदाएँ,

अब बदल जाओ चरम होता जा रहा है।

 

कभी उठते फिर कभी तुम गिर रहे हो,

जो  किया  तुमने , वही  तो  भर रहे हो!

 

खेत  बंजर सूखी नदिया क्या  मिलेगा,

भूख    से  हरदम ग्रसित फिर तू रहेगा।

मान  जाते  आज  हम  तो  ये  न होता,

रक्त   आंसू    की   जगह  तेरा  बहेगा।

 

जी रहे  थोड़ा हो  , ज्यादा  मर  रहे हो।

जो  किया  तुमने , वही  तो  भर रहे हो!

 

पेड़   कलियां   तो निरंतर कट रही है,

प्राण     वायु   भी निरंतर  घट  रही है।

आग  इतनी  है  लगी   मन  मे  तुम्हारे,

ताप  से  उसके  तो  धरती फट रही है।

 

रोशनी  खुद   की  ,अंधेरे   धर  रहे  हो,

जो  किया  तुमने , वही  तो  भर रहे हो!

नैमिष त्रिवेदी

 

समोसा

कितना जरूरी है ज़िन्दगी के लिए समोसा

कभी कभी सोचता हूँ क्या होता जो ना होता समोसा

 

हम सरकारी अधिकारियों की हर meeting है अधूरी

बगैर समोसे के ये हो ही नही सकती पूरी

 

जिसने ना समोसा खाया ना कभी देखा उसकी हालत है ऐसी

मान ही नही सकता उसे भारतीय वो है 100% विदेशी

 

पूरा जीवन जो गुजार दे बगैर खाये समोसा

ऐसा शख्स मैंने तो आज तक नही देखा

 

मसालेदार आलू और मैदे से होता है ये निर्मित

गरमागरम तेल मे तलने के लिए किया  जाता है समर्पित

 

समोसा सदियों से पूर्णरूप से हमारे मानस पटल पर छाया है

साथ अगर खट्टी मीठी चटनी ,दही मिल जाए तो यही मोक्ष है बाकी सब मोहमाया है

 

समोसा बड़ा मिलनसार होता हर किसी के साथ मिल जाता है

छोले, मटर, चना, सांभर,कढ़ी तो कभी तो मिर्च के साथ भी चल जाता है

 

गरमागरम सुनहरे वर्ण के  समोसे को देख किसी का भी हृदय खिलेगा

होटेल, मॉल, एयरपोर्ट, टॉकीज, स्टेशन, कैंटीन जहाँ चाहोगे वहाँ मिलेगा

 

सुबह नाश्ते मे, दोपहर खाने कब बाद, या शाम को चाय के साथ इसके दर्शन मात्र हो जाये

तो यकीन मानिए कितना भी बुरा हो .........पर दिन सफल होजाये

 

हाँ..एक बात समोसे का भूख से नही है कोई लेना देना

क्योंकि ये नियम हमने समोसे पर लागू ही नही होने देना

 

समोसा हो सामने तो दिमाग काम करना बंद कर देता है सर पे नाश सा छा जाता है

समोसा दिखे तो मौसम बन जाता है बस यूं समझिये प्यार हो जाता है

 

समोसा दिखे तो कोई व्यक्ति खाये बिना रह नही सकता

समोसे को कोई ना कह दे ऐसा प्राणी इस देश मे हो नही सकता

 

समोसे को ना कहने वाले यकीनन दो चार होंगे

वो भी बेचारे नादान, बीमार या फिर लाचार होंगे

समोसों मे एकता का स्वभाव बहुत बड़ा होता है

क्योंकि अकेला एक समोसा पेट मे जाने को तैयार ही नही होता है

पहला समोसा खाते ही दिल मे चढ़ जाता है खुमार

और आंखे दूसरे समोसे का करने लगती है इंतेज़ार

समोसा देखते ही हमारी अक्ल घास चरने चली जाती है

Cholestrol report, डॉक्टर की सलाह सब धरी की धरी रह जाती है

बस समोसा मन मे होता है और सारी दुनिया पीछे छूट जाती है

समोसों के दीवानों को तो समोसे तलने की खुश्बू भी बहुत भाती है

मैं तो कहता हूं हम जैसो को चटोरो को समोसे से पोषित कर देना चाहिए

आम अगर राष्ट्रीय फल है तो समोसे को राष्ट्रीय खाद्य पदार्थ घोषित कर देना चाहिए

राकेश वर्मा

 

समोसा पर पढ़ी कविता तो समोसा याद आया,

पूरे लॉक डाउन डर से हमने ना खाया,

कोशिश की कई बार और घर पर भी बनाया,

उसमें लेकिन बाज़ार वाला वो स्वाद ना आया,

आज फिर इसका नाम नज़र में जो आया

फिर से खाने का मन कर आया।

प्रेरणा

 

 

 

पेट बनाम इश्क

पेट का सम्बन्ध होता, जीभ से कुछ इस तरह,

आशिक का सम्बन्ध हो, माशूका से जिस तरह |

 

स्वाद चटती जीभ है पर, पेट भरता पेट का,

खर्च भी आशिक है करता, जैसे बेटा सेठ का |

 

है फ़िदा,हर स्वाद पर, चटपटा कुछ चाहिए,

होता कबाड़ा पेट का, क्या जीभ को समझाइये ?

 

ऎसी ही  माशूका होती, जिसको सब कुछ चाहिए

कंगाल आशिक हो रहा, कैसे उसे समझाइये ?

 

होते होते एक दिन ऐसा महूरत आ गया,

पेट पर उस जीभ का जादू सा जैसे छा गया |

 

बंध गए बंधन में दोनों, खा के कसमें आग की,

पेट क्या जाने कि ज्वाला, मिट गयी है भाग्य की |

 

फिर चटोरी जीभ, पत्नी बन के यों चलती रही,

हुक्म का फरमान जारी, पेट पर करती रही |

 

धीरे धीरे पेट का, इतना कबाड़ा हो गया,

मजबूत कुतुबमीनार, टूटा इमामबाड़ा हो गया |

 

कब्ज़ की बुनियाद बैठी, अम्ल का घर हो गया,

था बहुत मजबूत लेकिन, पेट इक दिन सो गया |

 

पति महोदय की दशा भी, पेट जैसी हो गयी,

नून, लकड़ी, तेल में वह, आशिकी भी खो गयी |

 

इसलिए हे आशिकों ! माशूक खोजो इस तरह,

जीभ पर कण्ट्रोल होवे, पेट का भी जिस तरह |

प्राणेन्द्र नाथ मिश्र