शनिवार, 1 जनवरी 2022

शिल्पी संवाद भाग 010

 

दोस्तों!

सबो को नव वर्ष 2022 की हार्दिक शुभकामनाएं|

“शब्द सत्ता के शिल्पी” नामक व्हाटसएप समूह में होने वाली दैनिक कविता विनिमय विवरण आपके सामने प्रस्तुत है| इस बार के शिल्पी संवाद में नव-वर्ष 2022 पर साझा की गई कविताओं की एक झलक देखिए|

 

डॉ हिमांशु शेखर

नव वर्ष विशेषांक

01.01.2022

आज के शब्द शिल्पी

प्राणेन्द्र नाथ मिश्र

मीनू वर्मा

प्रेरणा पारिश

अरूण कुमार दुबे

आशीष दिक्षित

सुलेखा कुलश्रेष्ठ

डॉ. सतीश चन्द्र भगत

सुरेंद्र प्रजापति

नवनीत पुष्परस


कुछ उदगार

 

“शब्द सत्ता” नामक ई-पत्रिका मेरे लिए एक प्रयोग था, जिसमें इंटरनेट का प्रयोग कर कवियों को प्रकाशन का एक मंच दिया जा सके| मुझे खुशी है कि इसमें मुझे बहुत हद तक सफलता मिली है और इसके तीन अंक निर्धारित समय पर प्रकाशित होते गए है| इसके द्वारा मै भारत के कोने कोने से कई कवियों से जुड़ा हूँ| इसके लिए एक व्हाट्सएप समूह बनाया गया है, जिसमें कविगण एक दूसरे को प्रोत्साहित करते रहते है| उस समूह में साझा कविताओं का परिणाम है ये “शिल्पी संवाद”| नव वर्ष में इसका रूप थोड़ा बदला गया है|

इस अंक में जिन कवियों की कवितायेँ है, उनका थोड़ा विवरण देने की इच्छा नव वर्ष के प्रथम अंक में हुई|

मुझे कलकत्ता से श्री प्राणेंद्र नाथ मिश्र जैसे विद्वान् और कलम के धनी अभियंता साहित्यकार का सान्निध्य मिला| दिल्ली के आसपास के क्षेत्रों से प्रेरणा जी और मीनू जी का सहयोग मिला| मेरे कृष्ण भक्त मित्र पटना से इंजीनियर अरूण कुमार दुबे जी की अनवरत कविताओं से भक्ति का मार्ग प्रशस्त हुआ| कानपुर से आशीष जी और गाजीपुर से नवनीत जी आज की युवा पीढी का प्रतिनिधित्व करते है| बंगलूरू से सुलेखा जी युवा पीढी को संभालने वाली पथ प्रदर्शिका अध्यापिका है| बनौली, दरभंगा से डॉ सतीश जी बाल काव्य के स्रोत है| गया के सुरेन्द्र जी आंचलिक और ग्रामीण परिवेश के सशक्त रचनाकार है|

यह शिल्पी संवाद अनवरत चलता रहे, यही आभिलाषा है| जब भी पर्याप्त कवितायेँ एक विषय पर जमा हो जाती है, तो इसका एक अंक बन जाता है| ये इसका सैन्तालिसवां अंक है| आशा है कि पाठको को यह अंक पसंद आएगा| उम्मीद है कि “शब्द सत्ता” के चौथे अंक से पूर्व “शिल्पी संवाद” के पचास अंक बाहर आ जाएंगे|

धन्यवाद|

 

डॉ हिमांशु शेखर


 

जाते हुए वर्ष को समर्पित

 

बीते पल बाँध रखे हमने,

आँखें  मूँदे औ  निहार करें,

जीवन से जुड़ गए हैं वे पल

जीवन जैसा व्यवहार करें

आओ, यादों को प्यार करें..

 

मत कहो, प्रदूषित है संध्या

कल की कल देखी जायेगी,

यह सांध्य जोड़ती ऊषा से

आओ इसका सत्कार करें...

आओ, यादों को प्यार करें...

 

क्षण भंगुर है, पर चलता है

यह पल, कुछ अपनी साँसों सा,

हर पल ने दिया है प्राण हमें,

जाते  पल का अभिसार करें..

आओ, यादों को प्यार करें..

 

सूर्यास्त हुआ, या सूर्योदय

इस प्रकृति ने छीना कुछ भी नहीं,

हम गोद में इसकी सो करके,

अपनी माँ सा व्यवहार करें...

आओ, यादों को प्यार करें..

 

नूतन कुछ नहीं पनपता है,

जब तक न जुड़ा हो पुरातन से

अपनी संस्कृति को अक्षुण्ण रखें

अपने भारत का दुलार करें

आओ यादों को प्यार करें..

 

प्राणेन्द्र नाथ मिश्र

 

साल की आखिरी रात

 

मायूसी में घिरा है सबका मन,

सहमा हुआ है धरा पर जीवन,

कोरोना दूर नहीं हुआ है अभी

मौसम भी है बर्फ में अभी सनी,

आखरी रात है साल का यह

आई है नयी बहार अभी नहीं,

दूरी दो गज की बनाकर रखों सभी......

उल्लास मनाना अभी ठीक नहीं।

 

छाया है साम्राज्य धूंध का अभी,

चिंतित है धरा अभी मेरी,

मत छेड़ो खुशी के राग अभी

कई लोगों के ज़ख्म अभी भरे नहीं।

मिलकर कष्ट एक दूसरे के हरो सभी

गीत खुशी के गाना अभी ठीक नहीं।

 

निराश है मन कई लोगों का अभी,

खुशियों ने दस्तक सबको दिया नहीं,

दर्द के बादल‌ अभी छंटने दो,

चेहरे सबके हर्ष से खिलने दो,

इंतजार कुछ वक्त का अभी शेष है,

शीघ्रता दिखाना अभी ठीक नहीं।

 

घायल है चोटिल है.....

जन मानस का हृदय,

घाव अपनों से बिछड़ने का अभी भरा नहीं,

तानाशाही तम का अभी कायम है,

दुल्हन सी धरा अभी सजी नहीं,

बसंत के रंग अभी बिखरने दो,

हर जीवन में पुष्प.....

आनंद के अभी खिलने दो,

उत्सव मनाना अभी ठीक नहीं।

मीनू वर्मा

 

 

जाते हुए वर्ष को समर्पित

 

अंतिम संध्या, अंतिम बेला,

अंतिम किरणों का अन्त्य गीत,

अंतिम पल का यह अंतर्मन

अंतिम पुकार देता, हे मीत !

 

अंतिम धारा, अंतिम प्रवाह

अंतिम कलरव, अंतिम है कूक

अंतिम बंधन में बाँध रखो

धडकन की अंतिम ह्रदय-हूक.

 

अंतिम है दृश्य-पटल, यह नाट्य

अंतिम दर्शक, अंतिम समूह,

अंतिम का अंत न कर देना

अंकित कर लो यह छवि दुरूह.

 

अंतिम का अंत हुआ यदि तो

प्रारब्ध नही हो पायेगा,

अंतिम से जोड़कर आदि रखो

तब दृश्य नया दिखलाएगा.

 

निःश्वास रखो अंतिम लेकिन

फिर श्वास भरो अंतिम पल में,

मानवता विलगित ना होए

आँखें खोलो नूतन कल में.

 

अंतिम का अंत हुआ जिस दिन

होगी अंतिम वह सृष्टि क्रिया,

जोड़ो भविष्य से भूत काल

प्रज्वलित रहे संस्कृति-दिया.

 

कल की मिट्टी से बना दिया

हम आज प्रज्वलित करते हैं,

तुमको प्रणाम, हे विगत वर्ष !

नूतन, अभिनंदित करते हैं...

 

प्राणेंद्र नाथ मिश्र

 

 

 

अधूरी इच्छाएँ

 

अधूरी इच्छाएँ

अधूरे संकल्प

सब हों मुकम्मल

नूतन वर्ष।

 

ख़्वाब पुराने

अधूरे अफसाने

सब हों पूरे

नूतन वर्ष।

 

दर्द कचोटते

दुखती यादें

सब भुला दें

नूतन वर्ष।

 

नई उम्मीदें

नया विश्वास

सब जगा लें

नूतन वर्ष।

 

मन में धीरज

आशा का सूरज

हम चमका लें

नूतन वर्ष।

 

स्वप्न सजीले

मन के मंजीरे

हम बजा लें

नूतन वर्ष।

 

पलकें बिछाए

नव उत्साह से

हम करें स्वागत

नूतन वर्ष।

 

मुड़ के ना देखें

भुलाएँ हर गम

नव आशाओं का करें स्पर्श

नूतन वर्ष।

 

प्रेरणा पारिश

 

नव वर्ष शुभकामना

 

समय की बहती नदी के किनारे बैठ कर

मैंने लिखी हैं शुभ कामना आपको।

मैं विकल्पों की विवशता का वास्ता क्या दूं?

संकल्पों का सिपाही हूँ मैं,

मेरी यह हार्दिक शुभकामना है आपको||

 

सूर्य सा दहके आपका साल,

शौर्य से दहके आपका भाल,

चिड़ियों सा चहके आपका घोंसला |

फूल सा महके आपका प्यार,

और बढ़ता जाए आपका हौसला ||

 

अरूण कुमार दुबे

 

 

 

पश्चिमी नव वर्ष

 

हम सनातन धर्म के है कर्म मेरा ये नही है

होगा किसी का पर नव वर्ष मेरा ये नही है

 

चैत्य की वो  पुण्य बेला  धर्म मेरा ही वही है

आज ये यदि पश्चिमी है नववर्ष मेरा ही वही है

 

हम किसी की सभ्यता औ संस्कृति अपनाए क्यूं

है हमारे पास यही तो हम पश्चिमी हो जाए  क्यूं

 

जिस देश में निज संस्कृति औ सभ्यता न मान होगा

नष्ट होगा नष्ट होगा देश वो तो अन्तता फिर नष्ट होगा

 

भूल कर निज देश गौरव  आज पश्चिम हम हो रहे हैं

आर्य संस्कृति का पतन अब  खुद ही  हम खो रहे हैं

आशीष दिक्षित

 

स्वागत नूतन वर्ष का

 

आओ स्वागत करें नूतन वर्ष का।

शिलान्यास करें नव उत्थान उत्कर्ष का।

 

 बीता वर्ष किसी के अपने ले गया ।दुख दर्द संताप के घाव दे गया ।

 

कितनों की आंखों में है नमी अभी तक।

 कितनों के अश्रु ताजा हैं अभी जमीं पर ।

 

आओ दिया जलाए फिर से हर्ष का आओ स्वागत करें नूतन वर्ष का। शिलान्यास करें नव उत्थान उत्कर्ष का।

 

जो कल था वह अब बीत गया ।

उनको बधाई जो जिंदगी की जंग जीत गया ।

अब इस वर्ष कोई हताहत ना हो।

 सभी की काया स्वस्थ निरोग हो ।

 

पुनः उठे दमन करें मन  निराश का। आओ स्वागत करें नूतन वर्ष का। शिलान्यास करें नव उत्थान उत्कर्ष का।

 

शुभारंभ करें नवजीवन का पुनः।

दर्द संताप विलाप को भूलें।

 

हे ईश्वर इस नव वर्ष में कोरोना को जड़ से मिटा देना।

खुशी प्रसन्नता हर्षोल्लास की सौगात दे देना ।

 

आओ ईश्वर से प्रार्थना करते हैं सबके जीवन में खिलाए पुष्प पलाश का।

आओ स्वागत करें नूतन वर्ष का।

शिलान्यास करें नव उत्थान उत्कर्ष का।

 

सुलेखा कुलश्रेष्ठ

 

 

गौरव-पुत्र देश के जागो रे

 

देखो फूट रही है नववर्ष में

किरणें लाल- लाल जागो रे!

 

टूट जाए तम का दुखद बसेरा

बीत गई अब रात हुआ सबेरा

कब तक आखिर सोओगे तुम

आलस त्याग कर  जागो  रे  !

 

देखो फूट रही है नववर्ष  में

किरणें लाल- लाल जागो  रे!

 

आओ मिलकर कदम बढ़ाएं

सुखमय जीवन संसार बसाएं

बढ़े सभी प्रगति पथ पर आगे

मंजिल करती है  आह्वान  रे!

 

देखो फूट रही है नववर्ष में

किरणें लाल- लाल जागो रे!

 

ऐसा तुम संसार  बसाओ

कि पंछी भी उन्मुक्त गगन में

उड़े घोसला छोड़ ओ साथी

गौरव-पुत्र देश के जागो रे!

 

देखो फूट रही है नववर्ष  में

किरणें लाल- लाल जागो रे!

 

कण- कण में खुशहाली आए

सोच- समझ कर कदम बढ़ाओ

नस- नस में छिपी शक्ति  है

सही दिशा में उसे लगाओ   रे!

 

देखो फूट रही है नववर्ष में

किरणें लाल- लाल जागो रे

डॉ. सतीश चन्द्र भगत

 

नव वर्ष मंगलमय हो

 

नव वर्ष मंगलमय हो,

        मानवता की जय हो!

 

स्वागत! नए प्रभात में

स्वागत! ठिठुरते वात में

स्वागत! अकड़ते ठंढ में

स्वागत! असभ्ये ढंग में

स्वागत! धुंध प्रकाश में

स्वागत! बिखरते आस में

दुर्लभ जीवन के नव किरण

स्वागत! खण्डित निर्वात में

नवल निर्माण की जय हो,

       नव वर्ष मंगलमय हो!

 

आओ! नवीन विचार, स्वप्न

निर्माण का बीज बोने दो

जागरण के नवीन दिवस में

तिमिर, दीन, त्राण धोने दो

जागृति का शंख फुंक दो

कोहरे से गले लिपटकर

मानवता फिर-फिर जय बोले

तम, निराशाओं में पलकर

जन का कल्याण विजय हो

         नव वर्ष मंगलमय हो!

 

स्वर्ण विहान ले हाथों में

समृद्धि का गौरव पा लो

महाक्रांति की ज्वालाओं में

पुष्पों का सौरभ पा लो

मेरे हिन्द की धरती पर

नव उत्थान सृजन कर दो

थके हुए मुर्दे शरीर में,

नूतन प्राण को भर दो

नवीन अरमान अजय हो

        नव वर्ष मंगलमय हो!

 

स्वागत मेरे चंचल गीत

मेरे आगत, मेरे विहान

युगों से जगते, तपते

पिसते कृषक का इम्तहान

कंकाल मात्र है देह शेष

श्रमिक का रोता हुआ श्रम

मजदूरों का संघर्ष अकाट्य

स्वागत! दलितों का क्रंदन

पतितों का उत्थान निर्भय हो

        नव वर्ष मंगलमय हो!

 

सभ्य, अट्टालिका का नरेश

मद का विचार तोड़ो-तोड़ो

गिरे, मलिन, दुर्बल काया

दो अभयदान गति को मोड़ो

मिले भुखे को अन्न वस्त्र

और प्यासे को निर्मल जल

नई सृष्टि में नव क्रांति का

नए-नए बलिदान प्रबल

नव समाजवाद का उदय हो

         नव वर्ष मंगलमय हो!

सुरेंद्र प्रजापति

 

नवल  वर्ष  की  देते  बधाई, गाओ मंगल गान,

खुशियां  तेरे  दर  पर  झूमें, बना  रहे ये शान।

नई  तिथि के  नई घड़ी में,  करो राष्ट्र  उत्थान,

करते प्रणाम हैं सबको, हरदिल को दो सम्मान।।

 

नवनीत पुष्परस