दोस्तों!
“शब्द सत्ता के शिल्पी” नामक व्हाटसएप समूह में कविता विनिमय एक अनवरत चलने वाली गतिविधि है| इसमें प्रकाशित कविताओ को ब्लॉग के रूप में प्रकाशित करने की व्यवस्था की गई है, जिसमें एक छोटे अंतराल में प्रकाशित कविताओ का संकलन किया जाता है, जो स्थान, व्यक्ति, काल विशेष पर आधारित होते है| जून के अंत में रिमझिम वर्षा की फुहार में भींगी कविताएं पटल पर साझा हुईं। इस कविता विनिमय की एक झलक इस पोस्ट के माध्यम से आप के सामने प्रस्तुत है| यह पोस्ट दिनांक 29 जून 2024 को प्रकाशित किया गया|
डॉ हिमांशु शेखर
इस अंक के सारस्वत शब्द शिल्पी
निशा राय, नोयडा
डॉ.शिवजी श्रीवास्तव, नोएडा
प्रेरणा पारिश, नई दिल्ली
डॉ हिमांशु शेखर, पुणे
प्राणेन्द्र नाथ मिश्र, कोलकाता
एक ग़ज़ल
आज धरती पे कुछ नमी सी है।
दिल की धड़कन कहीं थमी सी है।
अब भी उम्मीद दिल में कायम है
शाम जाते हुए, शमी सी है।
किसने भेजे हैं ये घने बादल
किसके घर आज मातमी सी है?
और कुछ ज़ख्म दिखाओ मेरे
तेरी आँखों मे, मरहमी सी है।
चाँद रोया है कल, अमावस में
इसकी सीरत भी कुछ हमी सी है।
दिल्लगी अब नहीं बेगानों से
दिल मे अब हुस्न के गमी सी है।
आसमां डूब गया, डूब गये हैं तारे
हालत शफ़क़ की अब, ज़मीं सी है।
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प्राणेन्द्र नाथ मिश्र
बारिश
बूंदों की छमछम
चिड़ियों का राग है
जगाया बारिश ने
हर मन अनुराग है ,
तप्त धरती तृप्त हुई
आह्लादित और सिक्त हुई ,
हरे हरे खेत मचलकर झूमते
कारे मेघा मुख पर्वत का प्यार से चूमते,
धानी चुनर ओढ़ अवनि ने
रूप अपना सँवारा है
मोर ने पंख फैलाकर
मोरनी को किया इशारा है,
काग़ज़ की नावों में नन्हें से सपने
भरकर बचपन प्यारे से अपने
पानी पर तैरा खुशी से इठलाए
बलखाये जो नैया,झूमे इतराए,
तपन से देता सावन सुकून और राहत
हर मन जाग जाती प्रीत की चाहत,
बागों में डालें झूले
आ गगन को चल छू लें,
कण - कण,मन - मन
नवऊर्जा जगाए
सावन मस्ताना
जब झूम के आए।
प्रेरणा पारिश
वर्षा गीत
जिंदगी में गम बहुत है
छोड़िए,मत खीझिए
लुत्फ मौसम का जरा सा लीजिए
देखिए बाहर फुहारें
सावनी झरने लगी हैं
झरर झर बूंदे धरा पर
नृत्य सी करने लगी है
बारिशों में भीग कर क्यों,
खिल रहे चेहरे सभी के
आप भी आकर जरा
बारिश में थोड़ा भीगिए।
मृदु लताएं वृक्ष से
अठखेलियां करने लगी हैं
भरीं नदियां अकड़ में अब,
उछल कर चलने लगी हैं
दूर कजरी गा रहा
कोई मछेरा मौज में
साथ उसके आप भी
आलाप कोई लीजिए।
डॉ.शिवजी श्रीवास्तव
जुगुप्सा बारिश की
नाक बहते बच्चे ने छींका ज़रा
सुडसुड़ाती नाक बाहर आ गई
और फैली छींक की ऐसी फुहार
दूर पर दीवार, धब्बा खा गई।
फिर उठाया हाथ, पोंछा नाक को
नाक की नाली थी, बायें हाथ पर
धार लंबी, उंगलियों तक आ गई
दोस्त का उसने न छोड़ा साथ पर
छा गए आकाश में काले घने
मेघ, बूंदों की कवायद हो गई
हाथ पर टप टप पड़ीं जब बूंद कुछ
नाक सूखी थी, मगर वह धो गई।
फिर मला बच्चे ने दोनो हाथ को
साफ पूरा अपना चेहरा कर लिया
मेघ के पहले छटा की यह घटा
जेबों में मिश्रण भी थोड़ा भर लिया।
प्राणेंद्र नाथ मिश्र
पहली बारिश
पहली बारिश में बूँदों की छमाछम है
पानी की बौछार से भीगा तन मन है
वैसे ये हर मन में जगाते अनुराग हैं
पशु ,पक्षियों का भी हर्षित राग है
शहर, सड़क, गली धूल कर साफ़ हो रही है
तपती धरती भी थोड़ी तृप्त हुई है
फल ,फूल भी धुलकर खिल रहें हैं
खेत भी बारिश की टप टप बूँदों से झूम रहें हैं
सुखी नदियाँ भी ख़ुशी से लबालब भर गये है
मोर भी झूम झूम नृत्य कर इस उमंग में शामिल है
घिर घिर बद्रा आज खूब बरस रही है
बाहर निकल थोड़ा भीग लीजिये
थोड़ा बूँदों हथेली में बंद कर चल लीजिए
ख़ुद से थोड़ा मिल लीजिये
बचपन की यादों को ताज़ा कर लीजिए
मन की ख़ुशी संग झूम झूम मुस्कुरा लीजिए
धड़कनों में बजती प्रीत की राग भी सुन लीजिए
इस पहली बारिश में मन को हरा भरा कर लीजिए ।।
निशा राय
बारिश का आगमन
जहां पानी नहीं था, और गर्मी भी जलाती थी,
फुहारें बारिशें लाई, फिजा बस गुनगुनाती थी।
चले टैंकर लिए पानी, कहा था माफिया छाया,
मगर अब नीर पा प्यासी, खुशी के गीत गाती थी।
नहीं एसी जरूरी अब, नहीं कूलर लगाना है,
जरा ठंढा हुआ मौसम, रजाई भी लुभाती थी।
सड़क पर जम रहा पानी, निकासी की परेशानी,
मरा सूखा पिए पानी, फसल भी लहलहाती थी।
बने थे डैम, पानी को जमा करते दिखाई दें,
सभी के गेट पर जल भर रहा, ऐसा बताती थी।
हुए बच्चे बहुत खुश, नाव कागज के चले देखो,
कहे शेखर हुआ ईलाज, गर्मी का दिखाती थी।
डॉ हिमांशु शेखर
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