दोस्तों!
“शब्द सत्ता” के शिल्पी नामक व्हाटसएप समूह
में होने वाली दैनिक कविता विनिमय विवरण आपके सामने प्रस्तुत है| आज दिनांक 17.10.2020
की एक झलक देखिए|
डॉ हिमांशु शेखर
नवरात्रि की गूँज, और सर्वशक्तिमयी माँ की आराधना का पर्व शुरू होने जा रहा है| मातृरूपा, मेधा रूपा, श्रद्धा रूपा माँ , के आगमन की तैयारियां शुरू हो गयी हैं| इस अंक में माँ दुर्गा की अराधना संकलित है|
इस अंक का शब्द शिल्पी क्रम
प्राणेन्द्र नाथ मिश्र
डॉ हिमांशु शेखर
डॉ हिमांशु शेखर
आंचल
डॉ हिमांशु शेखर
सुरेन्द्र प्रजापति
प्रेरणा
प्राणेन्द्र नाथ मिश्र
डॉ. सतीश चन्द्र भगत
शरदकुमार सुमन ज्ञानेश्वर वेदपाठक (मंद्रुपकर)
आशीष दीक्षित
राकेश वर्मा
प्राणेन्द्र नाथ मिश्र
मीनू वर्मा
सुप्रिया पाण्डे
मीनू वर्मा
डॉ हिमांशु शेखर
माँ का आह्वान !
एक अबोध
बालक की तरह, माँ के आगमन की अगाध इच्छा रखते उए, मैंने एक कविता लिखी है, जिसमे उनके नौ रूप का स्पर्श है |
मैं हूँ
असमर्थ, अक्षम हे माँ !
कुछ शब्द
मगर, मैं लिखता हूँ,
कर देना
क्षमा हे माँ, दुर्गे !
मैं तुम पर
कविता करता हूँ |
माँ, रूप तुम्हारे अगणित हैं
दस दिशा, व्योम में व्याप्त हो तुम,
पर क्षुद्र, अकिंचन, मेरे
लिए
तुम हो
अगम्य, सर्वाद्य हो तुम |
नौ रूप
अलौकिक जीवन के
दिखते हैं
तुम्हारी भक्ति में,
तुम उद्गम
हो इस सृष्टि का
है परब्रह्म, तेरी “शक्ति” में |
दिखलाओ
प्रथम रूप माते !
बन कर के
‘शैलजा’ आ जाओ,
करबद्ध, स्थापित घट है माँ!
यह रूप इसी
में दिखलाओ |
बन
‘शैलपुत्री !’ वत्सलता दो
हो गए पुत्र
तेरे, कठोर,
भाई चारे का
प्रथम पाठ
फैले इस
विश्व के ओर छोर |
जपमाल, कमण्डल हाथ लिए
माँ!
‘ब्रह्मचारिणी’ बन आओ,
और, शांत, स्निग्ध, पावन करके
मेरे ध्यान
में माते ! बस जाओ |
बन कर के
‘चंद्रघंटा’ हे माँ!
तुम सिंहवाहिनी
सज आओ,
दिखला कर
दिव्य रूप सबको
हमे अभयदान
तो दे जाओ|
माँ !
‘कूष्मांडा’ बन कर आओ
हों सभी
अकिंचन, आह्लादित,
दुःख दूर
करो माते ! सब का
हो कष्ट, द्वार से निर्वासित |
हे देवि!
पांचवें दिन बन कर
‘स्कंदमाता’, तुम आ जाओ,
लेकर के
कमंडल, पद्म पुष्प
हमें
मातृरूप दिखला जाओ |
यह रूप
तुम्हारा है उदार
हम सबके
जन्मदाता का है,
तुम मातृरूप
में शोभित हो
एक स्नेहशील
माता का है |
षष्ठी के
दिन तुम, हे माते !
‘कात्यायनी’
बन कर आ जाना,
हम सब
भिक्षुक हैं रक्षा के
माँ !
अभयदान देकर जाना |
तुम पुत्री
रूप बनी आओ
दे जाओ
निश्छल, पवित्र प्रेम,
हम नमन करें
उस कन्या को
जो रखती
सबका कुशल-क्षेम |
माँ !
‘कालरात्रि’ का रूप धरे
जब सप्तमी
को तुम आओगी,
सारे
नकारात्मक विचार,
माते ! तुम
हर ले जाओगी |
पुष्पांजलि
लेकर हाथों में
मैं मन्त्र
पढूँ टूटा फूटा,
कर देना
क्षमा मुझे माते !
अपवित्र समझ
बालक, झूठा !
पुरुषोत्तम
राम, नहीं हूँ मैं
अगणित
दुर्गुण तुम पाओगी,
कर क्षमा, अष्टमी के दिन तो माँ !
दर्शन, क्य़ा नहीं दे जाओगी ?
वह धवल वर्ण, ‘महागौरी’ का
कर दे जो
प्रकाशित इस जग को
दिखलाना माँ
! वह दिव्य रूप
निर्मल होऊं, पाकर तुमको |
हे ‘सिद्धिदात्री’, नवमी की !
हे
मोक्षप्रदायनी देवी !
संताप हरो
तुम हम सबका
हे पद्म
विराजित, कुलदेवी !
सिद्धों, गन्धर्वों, यक्षों
से
राक्षसों से, और देवताओं से
तुम घिरी
हुयी हो, हे माते !
सृष्टि के
सब कर्ताओं से |
सब अर्घ्य
दे रहे हैं तुमको
करते हैं
अर्चना, हाथ जोड़,
माँ !
दृष्टि इधर भी कर लेना
मै परिधि के
बाहर, एक मोड |
नौ रूप
सम्मिलित भावों से
हे
सिद्धिदायिनी! आ जाओ,
हे योगशक्ति
! हे प्रकृति रूप!
माँ !
अभयदान, हमें दे जाओ |
आओ माँ ! घट
में, आँगन में
मेरे कष्ट
निवारण कर दो माँ!
करो क्षमा
मेरे अपराधों को
निर्मल मेरा
जीवन कर दो माँ !
प्राणेन्द्र नाथ मिश्र
मां दुर्गा
कल्याण करो,
दिल में हर
अरमान भरो,
शक्ति असीम
निर्माण करो,
मेरे जीवन
में प्राण भरो।
डॉ हिमांशु शेखर
नवरात्रि
में नव आवाहन,
मां दुर्गा
का पर्व ये पावन,
भक्ति की
शक्ति का सावन,
कृपा करो, माता मनभावन।
डॉ हिमांशु शेखर
इसकी भी
सुनो माता ,
उसकी भी
सुनो माता ,
हम सब की
सुनो माता,
जगजननी हो
तुम विधाता 2
अधूरी......
आंचल
जय महिषासुरमर्दिनि माता
जय महिषासुर
मर्दिनी माता,
शक्तिपुंज
ऊर्जा की दाता,
हर क्लेश को
दूर भगाता,
भक्ति से अब
जोड़ो नाता,
नाम जपो
करके जगराता ।
जय
महिषासुरमर्दिनि माता ।।
नवरात्रा का
शुभ दिन आता,
पुलकित हर
दिल होकर गाता,
शुभ होगा हर
संकट जाता,
जय जय हे
जगदम्बे माता ।
जय महिषासुर
मर्दिनी माता ।।
प्रकृति में
आनंद समाता,
खग सुंदर
संगीत सुनाता,
जीव-जंतु भी
शांति पाता,
जब सानिध्य
में आएं माता ।
जय महिषासुर
मर्दिनी माता ।।
धूप दीप सब
पावन भाता,
पुष्पांजलि
अर्पण है माता,
जब प्रसाद
चरणामृत पाता,
तृप्त हृदय
सुख-शांति पाता ।
जय
महिषासुरमर्दिनि माता ।।
डॉ हिमांशु शेखर
माँ दुर्गा स्तुति
जय जय माँ
जगदम्बे रानी
नव दुर्गा
जग की कल्याणी
नव रूपों
में,आती महारानी
तुझको
पुकारे मेरा आरती
माता !
स्वागत है आजा कमला भारती ।
नमस्तुभ्यम, नमो नमः
कालरात्रि
नमो नमः
शक्तिधात्री
नमो नमः
जयंती, मंगला, माँ
भद्रकाली
शारदा, शिवा, स्वाहा, काली
कपालिनी, धात्री, रूपों
वाली
दुःख निवारण
करनेवाली
जगमाता
पुकारे मंगल आरती
माता !
स्वागत है आजा कमला भारती ।
नमस्तुभ्यम
नमो नमः
सर्वव्यापक
नमो नमः
कालनाशक नमो
नमः
दुष्टों का
शमन करनेवाली
मधु कैटभ
दलन करने वाली
ब्रह्मा को
वर देनेवाली
पीड़ा को कर
लेनेवाली
आजा माँ !
तेरे पद को पखारती
माता !
स्वागत है आजा कमला भारती ।
नमस्तुभ्यम
नमो नमः
घट घट
निवासिनी नमो नमः
भुवन मोहिनी
नमो नमः
सुरेन्द्र प्रजापति
जागो मां! जागो!
हे चामुंडे!
हे कपालिनी!
भव भय, समस्त कष्ट तारिणी,
महिषासुर, शुंभ निशुंभ संहारिणी
सुखकारिणी सर्व मंगलकारिणी,
भू पर बढ़ता
जाता संकट
अपराध
अनाचार निष्कंटक,
धूमिल
भविष्य , गहन है निराशा
व्याप्त
सर्वत्र व्याधि और बाधा,
हे करुणामयी ,दुर्गतिशमनी
हर समस्त
पीड़ा दुःखहरणी ,
पतनोन्मुख
हुई ये धरती है
आस तेरी बस
आदिशक्ति है,
नरपिशाचों
का तू मर्दन कर
पी शोणित, तू सिंह- गर्जन कर ,
थर थर कांपे
दुराचारी - दुर्जन
जीवन हो
सुखमय और पावन,
तम हर दिव्य
प्रकाश भर माता
नवजीवन, विश्वास भर माता।
प्रेरणा
वंदना
तुम ही
प्रथम दुर्गा हो माते!
भवसागर
तारिणी, तुम्हे प्रणाम!
वृषभारूढ, हो तुम सुसज्जित
धन
ऐश्वर्यदायनी, तुम्हे प्रणाम!
तुम ही हो
त्रिलोक जननी
परमानन्द
दायनी, तुम्हे प्रणाम!
चराचर की
स्वामिनी हो तुम
महामोहविनाशिनी, तुम्हे प्रणाम!
हे
शैलपुत्री! तुम्हे प्रणाम!
प्राणेन्द्र नाथ मिश्र
माता दी को शत नमन
माता
दी को
शत शत नमन!
अहोभाग्य
हमारा है यह
जन्म लिया
भारत भूमि पर |
लगता हमें
स्वर्ग से सुन्दर
भले हमारा
है छोटा घर |
मिलता
यहाँ बहुत कुछ है
माता दी का
सुन्दर धाम है!
भारत की
सोंधी मिट्टी है
मन -
प्राणों को भी महकाती |
प्रकृति
यहाँ की मनमोहक सी
जीव-जंतु , चिड़िया है
गाती |
मनभावन लगती
है सबको
भारत माँ
की धरा- धाम है!
हर मौसम
लगता यहाँ की
सुन्दर-सुन्दर
अति मनभावन
सुनकर इसकी
यश- गाथा को
गूंजा
करता पवन
पावन |
माता दी की
स्मरण करने से
मिटते दुख
मिलते सुख तमाम है !
डॉ. सतीश चन्द्र भगत
देवी माँ की प्रार्थना
हे माता! तू
महिषासुर मर्दिनी,
शिवपुत्री
तुम महाकाली भवानी।
हे देवी!
कृपा करो हम सब पर,
दुःख संकट
हरो सब सत्वर ॥१॥
मानव में बस
कर आज भी,
सब
भूत-राक्षस घूम रहे हैं।
लो त्रिशूल
निर्दालन करो तुम,
ताकि सुख
शांति से जिए हम ॥२॥
हे माता! हम
प्रिय भक्त तुम्हारे,
देना अभय
संकट हरके हमारे।
हो कृपा नित
हम पर तुम्हारी,
बीते सुख
शांति से जिंदगी हमारी ॥३॥
कृपा
तुम्हारी माता हो जाये,
सुंदर सफल
जीवन हम पाये।
मंगल ही
मंगल बस हो सर्वत्र,
रहे हम सबके
मन सदा पवित्र ॥४॥
शरदकुमार सुमन ज्ञानेश्वर वेदपाठक
( मंद्रुपकर ) सोलापुर
जय आदि शक्ति माता
आदि है अनंत
है तू
ब्रह्म का
प्रतिबिंब है तू
सृष्टि की
प्रणेता तू
अंबे जगदंबे
मां
कात्यानी
महारानी तू
दुर्गा
अवतारी है तू
सृष्टि
रचयिता है तू
पालनहार
महतारी मां
दुष्ट की दुष्टता का
पाप गर बढ़
गया तो
सृष्टि की
रक्षा हेतु
तू काली है
भवानी है मां
लाल है ललाट तेरा
चक्षु लाल
लाल हैं
स्वरूप है
विराट और
खड़क भी
कमाल मां
शक्ति है तू
भक्ति भी है
मुक्ति का
तु मार्ग है
सृष्टि में
अनोखा तेरा
यह रूप
विकराल मां
आशीष दीक्षित
माँ दुर्गा के चरणों मे शत शत नमन
माँ दुर्गा
के चरणों मे शत शत नमन
हाथ जोड़
करते है उनका अभिवादन
आया हु माँ
मैं तेरी शरण
करले दुख
सारे मेरे हरण
माँ दुर्गा
के चरणों मे शत शत नमन
अपनी
दिव्यशक्ति से करदो इस जग मे उजाला
इस महामारी
जग से आपही कर सकती हो निकाला
कर ओ हमारे
दुखो का वरण
माँ दुर्गा
के चरणों मे शत शत नमन
माँ तुझमे
है शक्ति अपार
करती सदा
अपने भक्तों से प्यार
लगाओ न
किसीकी भी खुशियो को ग्रहण
माँ दुर्गा
के चरणों मे शत शत नमन
दे दो सबको खुशियां अपार
बनाये रखो
सदा भक्तो पर अपना प्यार
हर कोई
स्वतः आ जाए माँ तेरी शरण
माँ दुर्गा
के चरणों मे शत शत नमन
माँ दुर्गा
के चरणों मे शत शत नमन
राकेश वर्मा पुणे
महिषासुर मर्दिनी कथा
जलकर चिता
मे, रम्भ की
तब जान दे
दी, गाय ने,
ज्वाला मे
विस्फोरण हुआ,
जन्म लिया, अतिकाय ने ।
सिर था उसका
एक महिष,
और, धड़ था मानव का बना,
ना था पशु
और ना ही मानव,
वह एक
दानव अनमना।
देखकर
वैचित्र्य काया,
नाम, महिषासुर पड़ा,
अत्याचारी, पशुबली वह,
आततायी था
बड़ा ।
युद्ध मे
उसने हराया
देवता, दानव सभी को,
स्वर्ग पर
आधिपत्य कर,
त्रस्त करता
था सभी को ।
जब दिखा ना
पथ कोई
सब देव, ब्रह्मा तक गये,
क्रुद्ध
ब्रह्मा, ले के सबको,
विष्णु, शंकर
तक गये ।
हो गये
क्रोधित त्रिदेव,
कँप गया
ब्रह्माण्ड तब,
स्तब्ध सारे
हो गये -
क्या जाने
होगा काण्ड अब?
"क्रोध
- शक्ति" जग उठी,
शिव की, ब्रह्मा, विष्णु
की,
नष्ट करना
है यह दानव,
नही बात अब
सहिष्णु की ।
क्रोध की
शक्ति ने नारी
रूप धारण कर
लिया,
तब
त्रिदेवों ने उसे,
एक नाम
"दुर्गा" दे दिया ।
और कहा -
दुर्गा है यह,
यह क्रोध अपरंपार
है,
शक्ति
सीमाहीन है यह,
नेष्टि का
अवतार है।
फुफकारती वह
"शक्ति" तब
विकराल सी
बढने लगी,
सृष्टि
कंपित हो गयी और
प्रलय सी
दिखने लगी।
देख
"दुर्गा" को भयंकर
देवता सब डर
गये,
स्तवन करने
लगे और
दंडवत सब पड़
गये।
तब कहीं
जाकर के देवी
शांतमुद्रा मे
हुयीं,
"देती
हूँ अभयदान" -
यह गंभीर
वाणी मे कहीं।
देवताओं ने
उन्हें सब,
दिव्यास्त्र
अपने दे दिये
वंदना कर
देवगण ,
"शक्ति"
शरण मे हो लिए ।
तेजस थीं वह
त्रिदेव की,
थीं रूपसी
अद्वितीय भी,
अस्त्र-शस्त्रों
से सुसज्जित,
हो गयीं
रमणीय भी।
"हिम"
ने अपना सिंह दे,
वाहन बनाया
"शक्ति" का,
सिंहारूढ
दुर्गा, नमन का
रूप, केवल भक्ति का।
त्रैलोक्य
मे करने लगी,
विचरण वो बन
कर रूपसी,
दृष्टि
महिषासुर की उन पर
तब पड़ी एक
धूप सी।
मोहित हुआ, प्रस्ताव रखा,
विवाह करने
के लिये,
हँस के बोली
"शक्ति" -
"हो
तैयार लड़ने के लिए ?
जीत जायेगा
अगर तू,
वरण मैं
तेरा करूँगी,
हार यदि
होगी तेरी तो,
प्राण तेरे
मैं हरूँगी ।"
अट्टहासों मे गरजता,
युद्ध वह
करने लगा ,
एक अबला समझ
कर
हर चाल वह
चलने लगा ।
एक भयंकर
युद्ध तब,
आकाश मे
चलने लगा
देव, दानव, यक्ष, मुनि,
हर कोई डरने लगा ।
"शक्ति"
की क्रोधाग्नि ज्वाला
इस तरह से
बढ़ गयी,
हाथ मे लेकर
त्रिशूल
"वह"
असुर पर चढ़ गयी।
प्राणघातक
वार था,
शंकर का
उसमे तेज था
अगले पल, पैरों तले,
महिषासुर
निस्तेज था।
पुष्प
बरसाने लगे सब
यक्ष मुनि
और देवगण,
नमन कर, की वंदना,
देवी स्वयं
आयी सगुण।
प्राणेन्द्र नाथ मिश्र
प्यार भरा अर्पण
मां, तुम्हारी ,पूजा
करने
खाली हाथ मैं, आई
हूँ,
साथ में
अपना प्यार भरा दिल,
अर्पण करने
लाई हूँ।
मेरे पास
तुम्हें, देने को
कीमती कोई
वस्तु नहीं है।
पहनाने को
तुम्हें,
फूलों की
माला भी नहीं है।
कैसे पूजा
करूं तुम्हारी,
वाणी
में झंकार नहीं है
पर मेरे मन
के अंदर
कोई अहंकार
नहीं है ।
प्रभु
तुम्हारे लाखों पुजारी
ढेरों उपहार
लाते हैं,
खुशी -खुशी
चरणों में तुम्हारे
अर्पण कर के जाते हैं।
मैं तो साथ
में,कुछ नहीं लाई,
फिर भी, पूजा करने आई,
प्यार भरा अपना दिल,.…
तुझको,अर्पण करने लाई।"
मीनू वर्मा
मां पर विश्वास
मेरी जिंदगी
एक प्यास
है
तू ही मेरी
रस धार है
मेरी जिंदगी
के हर सवाल का
बस एक तू ही
जवाब है
कांटो भरी
कोई राह हो
था मैं तू
मेरा हाथ हो
मेरी जिंदगी
के हर तिमिर का
मां तू
अलौकिक प्रकाश है
इसछल कपट की
दुनिया में
तू ही मेरा
विश्वास है
यह जग है एक
परछाई
मुझे तो
तेरी ही आस है
मेरी प्रीत
तू मेरा पुण्य तू
तुझसे
ही बंधी
हर डोर है
तेरी आशीष
हम पर सदा रहे
मां तू ही
मेरा वरदान है
सुप्रिया पाण्डे
प्रार्थना
हे अंबे, जगदंबे माँ
सुन लो,सबकी बिनती माँ
तुम ही तो
रक्षक हो माँ
बुराई की
भक्षक हो माँ
प्रकाश में
तुम ,
अंधकार में
भी तुम्ही हो ,
सूरज , चांद ...
सितारों में
तुम हो।
साकार भी
तुम
निराकार भी
तुम्ही हो ,
पृथ्वी का
आधार भी तुम हो।
जल ,थल ,नभ
हर रूप में
तुम हो।
तुम ही जड़
चेतन मे भी
तुम्हीं हो।
अणु भी तुम
ब्रह्मांड
भी तुम हो,
सबकी सही
पहचान भी
तुम हो।
फूलों में
तुम
काटों मैं
भी तुम्हीं हो।
जीवनदाता भी
तुम
हंता भी
तुम्ही हो।
हे अंवे
जगदंबे मां
सुन लो, सबकी विनती माँ
मीनू वर्मा
शैलपुत्री संध्या वंदन
आगमन माता
का अनुपम,
मूर्त ना पर
शक्ति सक्षम,
दिल बना
पंडाल उसमें,
माता का
लहराए परचम।
दिल बजाए आज
सरगम,
भूलते सब आज
हर गम,
भक्ति में
गर लीन दिल तो,
आंखें भी हो
जाएंगी नम।
शक्ति से
काटेंगें हर तम,
दमनकारी को
करें कम,
माता बस आ
जाएं दिल
में, कौन कर पाए सितम?
दृश्य
मनभावन विहंगम,
कष्ट अब हो
जाएंगे कम,
सिंहवाहिनी
शैलपुत्री,
पहले दिन
अर्पित सुमन।
डॉ हिमांशु शेखर
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