रविवार, 16 मई 2021

शिल्पी संवाद भाग 007

 

दोस्तों!

“शब्द सत्ता के शिल्पी” नामक व्हाटसएप समूह में होने वाली कविता विनिमय विवरण आपके सामने प्रस्तुत है| इस बार के शिल्पी संवाद में 16.05.2021 के सप्ताहांत में साझा की गई कविताओं की एक झलक देखिए|

 

डॉ हिमांशु शेखर

 


आज के शब्द शिल्पी

सप्तर्षी

 

दीपक चौरसिया

सारिका अवस्थी

सुरेन्द्र प्रजापति

प्राणेन्द्र नाथ मिश्र

डॉ. सतीश चन्द्र भगत

पिंकी सिंवर मासूम

भरत सिंह रावत भोपाल

  

कर ले बन्द जोर से मुट्ठी

कर ले बन्द जोर से मुट्ठी

काल जिसे फिर खोल न पाए,

बोल सके जितने जिंदा है

मृत्यु किसी की बोल न पाए।

 

मत छोड़ो उम्मीदों को

हम लड़ लेंगे तूफ़ानों से,

दिल में रखकर मानवता

हम बढ़ लेंगे ईमानो से।

हाथ पकड़ लेंगे हम सबका

देखो कोई छूट न जाए,

मायामयी जगत में साथी

हमसे कोई रूठ ना जाए।

 

विपदा हो या स्वार्थ की आंधी

अपनेपन को मोल ना पाए,

कर ले बन्द जोर से मुट्ठी

काल जिसे फिर खोल न पाए।

 

भूत भविष्य को क्या बोलूं?

ये वर्तमान का ही फल है,

आज घटित जो हो रहा

इसका प्रसाद तो ही कल है।

आज चल रही है ये सांसे

जाने कल कब क्या होगा,

जीवन भर हंसना होगा या

सुख अपना मिथ्या होगा।

 

पीड़ा, प्राणों को मृत्यु के

पलड़े में रख तोल ना पाए,

कर ले बन्द जोर से मुट्ठी

काल जिसे फिर खोल न पाए ।

 

आज अंधेरा है अम्बर में

कल छट जाएगा ये बादल,

तब तक आओ दीप जलाएं

रोशन हो धरती का आंचल।

सीख लो त्याग दरख्तो से

जो अपना सबकुछ देते हैं,

पर मिथ्या स्वारथ में मानव

कुछ न दे बस लेते है।

 

आओ कसके पकड़ ले हम

इस काल से धरती डोल न पाए,

कर ले बन्द जोर से मुट्ठी

काल जिसे फिर खोल न पाए ।

दीपक चौरसिया

 

उम्मीदों का सम्बल

हे शीतल पवन सुनो तुम,

यहां धीरे से ही तुम आना ।

है क्लान्त ह्रदय यह मेरा,

यहां शोर नही तुम मचाना ।।

स्तब्ध ह्रदय हुआ है मेरा,

कैसे कहूं अब मन की बाते।

कुछ तो शेष है इस मन मे,

कुछ तो बन गई है  यादें ।।

विरान अरण्य सा जीवन,

असहाय सा हुआ है मन ।

खो गई है चेतना तन की,

शून्य सा लगता अब जीवन ।।

 

टूटे है मेरे विश्वास के धागे,

दिन - रैन नयन मेरे जागे ।

डूबी है आशा की किश्ती,

व्याकुल मन कहीं न लागे ।।

 

उत्पल - दल दृग ये मेरे,

अश्रुओ मे आज है डूबे ।

निस्तब्ध ह्रदय यह मेरा,

उम्मीदो का सम्बल खोजे ।।

सारिका अवस्थी

 

नए पत्ते

कनकने से नए पते

गीत में रमा हुआ सा

ए चमन के नए पते

कनकने से नए पते

 

कनकने से नए पते

फूटते हैं , जुटते हैं

डंठलों से जुटते हैं

प्रीत की ज्योति जगाकर

उन्माद, कोष को लूटते हैं

ये हरी है ये भरी है

कोंपलों भर युक्त लरी है

हरीतिमा परिधान इसका

है अनोखी शान इसका

प्रेम की माला बनाई

ओ सखी क्या आन इसका

तोड़ मत इसकी लताएं

गीत गाएं रीत पाएं

अनमने सी प्रीत पाएं

ये सरल, तरल पताएँ

तन फुटा हर दिशाएं

ये डगर के नए पते

गीत में रमा हुआ सा

ये चमन के नए पते

कनकने से नए पते

 

कनकने से नए पते

छेड़ मत इसको आली री

ऐ सखी री ऐ छली री

देख कोमल गात कहता

लोक कहता, काल कहता

प्रणय दहता, लहर चलता

माधुर्य रस का धार बहता

प्रखर झड़ता, मान महता

पुछ तो क्या चाहता है

खुले गगन क्या वाचता है

ऊंघता है, झूमता है

मुक्त में सर को हिलाकर

स्वर्ग से कुछ चुनता है

समीर बहता ताकता है

अपलक गति से झांकता है

सुर्य किरणों को बुलाकर

बहुत कुछ उगाहता है

स्थुल भूमि को ताकता है

ऐ मगन से नए पते

गीत में रमा हुआ सा

ये चमन के नए पते

 

कनकने से नए पते

गात इसका खुब चिकना

जाओ इसके पास जरा तो

देख इसका गात तरा तो

तल जरा तो, दल जरा तो

मानता न कल मरा तो

कोमल दल कोई काल इसका

मलमल उर में शाल इसका

हाल इसका जान लेना

लहराया क्या भाल इसका

कनकने से गर्भ भरता

ये छोटी के नए पते

गीत में रमा हुआ सा

ये चमन के नए पते

कनकने से नए पते

सुरेन्द्र प्रजापति

 

जीवन के तीन चरण

जीवन व्याख्यायित होता है

बस स्नेह, प्रेम और शृद्धा मे

समझो , नानी की कहानी से

एक डोर, शिशु और वृद्धा मे।

 

कभी विरह ज्येष्ठ की दुखदायी

कभी सावन मधुर दिखाती है,

समझो शृंगारित भाषा को

जो मूक प्रेम बन आती है।

 

जब रक्त-तिलक करके रमणी

करती है विदा पति को अपने,

वह शूरवीर बन जाता है

तब सोच सोच, घर के सपने।

 

जब दंत–विहीन पितामह को

छेड़ता है पौत्र, बाहों मे बैठ

तब वृदध भी शिशु बन जाता है

करता है समर्पण पुलक पैठ।

 

जीवन सुंदर है, स्नेहासिक्त

दुख है पर प्रेम, विमोचक है,

ये आयु चिन्ह हैं, समय पृष्ठ

जीवन की पुस्तक रोचक है।  

प्राणेन्द्र नाथ मिश्र

 

शाम के नाम - एक ग़ज़ल

मयकश की महफिलों में,मुझे छोड़ दे, ज़माने!

फिर चाक कर दे दुनिया, तू जाने, खुदा जाने ।

 

कोई जी के मर रहा है, कोई मर के जी रहा है,

इतनी तबाहियों में काम आयेंगे मयखाने।

 

जाती नज़र जहां तक, हर आदमी है मय्यत,

थोड़ी छिड़क दे इन पर, जीने के दे बहाने।

 

आदत नही की सोएं, सोने के बिस्तरों पर,

शीशे की खनखनाहट, लोरी लगी सुनाने।

 

मैदाने हश्र पर ही, होगा हिसाब सारा,

बेईमानी ना हुई तो, होंगे वहां मयखाने।

 

नजरों की बात छोड़ो, डालो जरा रंगीनी,

गाने लगी शफ़क भी, अब शाम के तराने।

प्राणेंद्र नाथ मिश्र

 

सूरज की किरण

उठो- उठो हो गया सबेरा

आंखें खोलो हुआ सबेरा

सूरज की किरणें आई है

पर गहरी नींद सतायी है |

 

उठो- उठो  खिड़की खोलो जी

जगा रही है मैया  तेरी

बुला रही सूरज की किरणें

उठने में तुम ना कर देरी |

 

उठो- उठो सूरज की किरणें

ताकत फुर्ती संग लाया है

रंग- बिरंगी चिड़िया भी उड़ती

लेकिन तुम क्यों अलसाया है |

 

मिट जाएगी थकान तेरी

चुस्त- दुरूस्त  हो जाओगे

उठो सबेरे कहते हैं सब

दुनिया में  नाम कमाओगे |

डॉ. सतीश चन्द्र भगत

 

आशा की किरण

गिरते- उठते संभलते चलो

मिल जाएगी मंजिल निश्चित |

 

लहराएगी फसलें

खुशियों वाली,

गुजर जाएगी

काली- काली

भयानक रात्रि

आएगी निश्चित

आशा की किरणें लेकर नई सुबह

गिरते- उठते संभलते चलो |

 

लम्बी छलांग लगाने से

कमजोर हुए हैं पैर हमारे

रखना है उम्मीद की किरणें

हौसले बुलंद सारे

मंजिल भी मिल जाएगी |

 

डटकर युद्ध लड़ेंगे

निश्चित जीतेंगे

फिर से आएगी

सुख की वर्षा निश्चित

मिल जाएंगे जीवन

गिरते- उठते संभलते चलो

मिल जाएगी मंजिल निश्चित |

डॉ. सतीश चन्द्र भगत

 

गजल

यादों के अंजुमन से निकल कर के, रुखसार पे आ गये,

लूढ़के आंखों के समंदर से पलकों की दीवार पे आ गये।

 

यहाँ कौन कितना अपना हैं पराया हैं, मुझे क्या मालूम,

लेके फरेब के तीर ओ कमान साहब शिकार पे आ गये।

 

भटकते भटकते ख्या़ल भी गुम हुए, धुंए के गुब्बार में,

निकले घर से जिंदगी की तलाश में मझधार पे आ गये।

 

तलाशते तलाशते तलाश ही लिया मंजिल को आखिर,

दीदार हो न हो मुकद्दर की बात हैं, ले तेरे द्वार पे आ गये।

 

ये शरारतें हम बख़्श रहें हैं बस तेरी मासूमियत देखकर,

सब सुधार देंगे खामियां मासूम, ग़र सुधार पे आ गये॥

पिंकी सिंवर मासूम

 

कमाल हो गया

कल तक था जो चिराग़, अब मशाल हो गया,

हैं ये मोहब्बत ए हसर, जो यूं बवाल हो गया।

 

घर से निकले हसरत ए दीदार में दिलदार की,

किधर, क्यूं, कैसे हर जुबां पर सवाल हो गया।

 

हैं अजीब लोग,ये लगाते मुर्दों की याद में मेले,

जिंदा तो किसी को याद नहीं कमाल हो गया।

 

भूले वतन के लाखों योद्धाओं की कुर्बानी को,

अरे कोई आशिक क्या मरा, मिशाल हो गया।

 

लोग तलाशते दुनिया में नये नये रिश्ते मासूम,

कोई करके पूजा माँ बाप की निहाल हो गया॥

पिंकी सिंवर मासूम

 

नई शुरुआत लिखती हूं

शब्दों के जादू से दिल ऐ जज़्बात लिखतीं हूं,

हां कुछ तेरे से कुछ मेरे से हालात लिखतीं हूं।

 

सालों चला मुकदमा मोहब्बत की अदालत में,

दिल पे जो जो गुजरी, वो वारदात लिखतीं हूं।

 

मुझे सताया गया, मेरी नींदों को चुराया गया,

भरी अदालत में, मैं ये इल्ज़ामात लिखती हूं।

 

हैं पहली मोहब्बत काग़ज़ क़लम व स्याही से,

लिखे लोग द से दिल, मैं तो दवात लिखती हूं।

 

मूक हो जाते हैं, जहाँ जाकर सारे रास्ते मासूम,

वहां से मैं जीवन की नई शुरुआत लिखती हूं॥

पिंकी सिंवर मासूम

 

गीत

मानवता पर आज चल रही, दानवता की आरी है।

आज जंग से आहत होती, दिखती दुनिया सारी है।।

 

ग्रहण लगाया खुशियों पर, अब देखो इस दानवता ने।

किंतु निभाया धर्म हमेशा, नेह भरी मानवता ने।।

आहत होती मानवता के कदम कभी भी रुके नहीं।

निष्ठुर दानवता के आगे, कभी ये योद्धा झुके नहीं।।

दिन दूनी बढ़ती जाती दिखती दानवता भारी है।

आज जंग से आहत होती, दिखती दुनिया सारी है।।

 

जो सफेद बर्दी में लिपटे, दानवता को ठेल रहे।

मानवता की रक्षा में वो, कष्ट अनेकों झेल रहे।।

त्याग दिया अपना सुख सारा, अपनों से बेमेल रहे।

फर्ज निभाकर दानवता पर, कसते सदा नकेल रहे।।

नमन उन्हें जो कष्ट भोग कर, रक्षा करें हमारी है।

आज जंग से आहत होती, दिखती दुनिया सारी है।।

 

मानवता के हर सैनिक की लगती प्यारी बोली है।

कर्म प्रधान मानती आई, यह मतवाली टोली है।।

सबको खुशियां बांट रहे, पर इनकी खाली थोरी है।

शस्त्र हाथ में रखते अपने, इंजेक्शन और गोली है।।

जिनकी मेहनत के बल से ही, ये दानवता हारी है।

आज जंग से आहत होती, दिखती दुनिया सारी है।।

 

किंतु यहाँ कुछ लोग आजकल मानवता को भूल गए।

धन के लालच में डूबे हैं, जिनके सभी उसूल गए।।

लालच में जो मानवता को ही करते निर्मूल गए।

फूल की जिनसे आशा थी, वो हमको देते शूल गए।।

रावत जिनके कारण बढ़ती भारत में बीमारी है।

आज जंग से आहत होती, दिखती दुनिया सारी है।।

भरत सिंह रावत

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