रविवार, 15 नवंबर 2020

शिल्पी संवाद भाग 003

 दोस्तों!

 

“शब्द सत्ता” के शिल्पी नामक व्हाटसएप समूह में होने वाली दैनिक कविता विनिमय विवरण आपके सामने प्रस्तुत है| आज दिवाली पर साझा की गई कविताओं की एक झलक देखिए|

 

डॉ हिमांशु शेखर

 

दीवाली विशेषांक

इस अंक के शब्द शिल्पी

 

मीनू वर्मा

सौम्या

डॉ. सतीश चन्द्र भगत

आशीष दीक्षित

प्रेरणा पारिश

सुरेन्द्र प्रजापति

 


 

दीपों का त्योहार

 

हमारे देश में,हर दिन...

कोई न कोई पर्व होता है।

पर....

दीपों का त्यौहार

सबसे सुंदर होता है।

 

अंधेरी रात,

दीपों से.....,

प्रकाशमान होती है,

खेतों में खड़ी, फसल,

जब, जवान होती है।

खुद तो आता है,

साथ,अपने....

कई त्यौहार लाता है।

धनतेरस ,भैया दूज से,

मन को खुश कर जाता है।

हर घर में खुशियों का

माहौल सजाता है।

हर्षोल्लास से.....

वातावरण को पूर्ण बनाता है।

 

नरसिंह का रूप, लेकर

 विष्णु जी ने....,

प्रहलाद को,

इसी दिन बचाया था।

भगवान राम भी....,

विजयी हो....

अपने घर को आए थे।

 

इसी दिन ....

विक्रमादित्य,अपने..

सिंहासन पर बैठे थे।

प्रकाश....

दीपकों का....

चारों दिशाओं में फैले थे।

 

हमारे देश में, हर दिन

कोई ना कोई पर्व होता है,

पर .....

दीपों का त्यौहार,

सबसे अलग होता है।

 

अमावस्या की रात,

पूर्णिमा की रात,

बन जाती है।

दीपों से सुसज्जित .…

जब सारा संसार होता है।

हर तरफ मेलों....,

जैसा माहौल होता है।

रंग-बिरंगे पटाखों से सजा

जब हर दुकान होता है।

 

हमारे देश में हर दिन

कोई न कोई पर्व होता है

पर....

दीपों का त्यौहार ....

सबसे सुंदर होता है।

मीनू वर्मा

 

दीपावली की धूम

नभ के बदले,

धरती पर है,

आज तारे उतरे हुए।

दीपावली का

पर्व है, आया।

सबने मिलकर,

धूम मचाया।

अनार फुलझड़ियां,

चल रहे हैं।

बच्चे खुशी से

उछल रहे हैं,

आसमान में है

राँकेट की झड़ी

जमीन पर अनार

रोशनी , कर रही।।

 

खुशियों की है,

लड़ी लगी,

देखो- देखो..

वह फुलझड़ी।

घर में,

लक्ष्मी पूजा हो रही

मिठाइयों की है,

नहीं कोई कमी..

एक दूसरे को सब

शुभकामनाएं है, दे रहे

मिठाइयों का,

आदान-प्रदान है, कर रहे

नभ के बदले,

धरती पर हैँ,

आज तारे उतरे हुए।

दीपावली का पर्व आया,

सब ने,

मिलकर दीप जलाया।

मीनू वर्मा

 

त्योहार

 

घर बार गलियां चौबारे

दीप जला हुए रोशन सारे

हम भी बैठे पलक बिछा के

खुशियों की राह निहारे

 

मिलजुल कर उड़ने वाली फुलझड़ियां

धूम धमाके भरे पटाखों की चिंगारियां

पकवानों की खुशबू से भरे रसोड़े

कितने बम बच्चों ने फोड़े

 

मां ने खोला रिवाजों का किवाड़

द्वार सजी रंगोली ने बढ़ाई शान

नये कपड़ों में सजे‌ हम इठलाते गुनगुनाते

बैठक में लगते हुए हंसी ठहाके।।

 

सौम्या

 

दीप जले हैं माटी के

 

घर- द्वारे आंगन चौबारे

नन्हें- नन्हें क्यारी -क्यारी

दीप जले हैं  माटी   के  |

 

झिलमिल- झिलमिल

हिलमिल- हिलमिल

घुलमिल -घुलमिल

 दीप जले हैं माटी के |

 

छाई घर- घर 

खूब खुशी है

दुल्हन जैसी

रात सजी है

दीप जले हैं माटी के |

 

सभी जगह ही

चहल- पहल है

डगर- डगर में

गाँव- शहर में

दीप जले हैं माटी के |

 

इनकी महिमा को पहचानें

खुद जलकर

चमकाता जग को

दीप जले हैं माटी के |

 

डॉ. सतीश चन्द्र भगत

 

 

खुशियों का त्योहार दिवाली

 

खुशियों का  त्योहार  दिवाली

जगमग-  जगमग दीपों वाली

ले जगमग दीपों  की   माला

भू  को पहनाने   आयी    है |

 

घर  आंगन  सब  सजे- धजे हैं

हर घर में  पकवान  बने    हैं

लिए साथ  में  खूब    उजाला

तमस  भगाने  आयी      है   |

 

छूटे  बम   नाची   फुलझड़ियां

मन में भर खुशियों की लड़ियाँ

दुख के घर में   डाले   ताला

सुख  बरसाने   आयी      है |

 

डॉ. सतीश चन्द्र भगत

 

1.  आज दीप जले है

     श्री राम के धाम में

     अद्भुत है महिमा

     श्री राम के नाम में

 

2. अब दीप चमकते

    आज अयोध्या धाम में

    अद्भुत है महिमा

    सीता पति श्री राम में

 

3.  दुनिया के हो पुरुषोत्तम तुम

     मानवता के उदधारक तुम

     सस्य् श्यामला बसुधा के

     असली ही जग नायक हो तुम

आशीष दीक्षित

दीपावली

मनाओ तुम दीवाली को

बहुत पावन सा दिन है ये

जगाओ तुम दीवाली को

बहुत आंनद मिलता है

 

जगमगा सी उठी धरती

प्रसन्न मन आज होता है

मिठाई घर में भी मिलती

मजा बाहर भी होता है

 

खुसी चेहरे पर हर दिखती

हमारे प्रभु राम आए है

प्रभु जी आज आए है

अयोध्या धाम आए है

 

बच्चे जवान या हों बुजुर्ग

अभिनन्दन श्री राम का करते है

कष्टों में पड़े हर एक व्यक्ति

वो सीख श्री राम से लेते है

 

आशीष दीक्षित

 

अबकी दिवाली कुछ ऐसे मनाएं

 

आओ अबकी दिवाली कुछ ऐसे मनाएं,

जग ही नहीं

मन का तम भी भगाएं,

उम्मीदों का हो दीपक

और विश्वास की हो बाती,

आत्मा जो हो रोशन

और जले ज्ञान ज्योति,

कैसा फिर अंधेरा,कैसी फिर उदासी,

आओ अबकी दिवाली कुछ ऐसे मनाएं

जग ही नहीं

मन का तम भी भगाएं ।

 

आज लौटे थे वापस

मर्यादा पुरुषोत्तम,

संग संग सीता मैया

और थे भ्राता लक्ष्मण,

दीए जल उठे थे

उमंगे खिली थीं,

अयोध्या की धरा को

श्री चरणों की धूली मिली थी,

छवि राम की हम दिलों में बसाएं

मर्यादा को उनकी आचरण में समाएं,

आओ अबकी दिवाली कुछ ऐसे मनाएं

जग ही नहीं

मन का तम भी भगाएं।

 

प्रेरणा पारिश

 

 

जलते ही रहना है

 

मिट्टी का तन, मस्ती का मन

मैं दीप ! जलते ही रहना है,

आशा की बाती नेह में भींगी

जगमग, तिमिर में दहना है।

मैं दीप ! जलते ही रहना है

 

पर्वत सा हो घनाकार अंधेरा

चाहे मार्ग में विघ्न हो घेरा

तूफानों से सामना हो मेरा

सागर की लहरों में मचल

निर्भीक पोत सा बढ़ना है,

मैं दीप ! जलते ही रहना है।

 

न राजमहल का वैभव प्यारा

न भिक्षुक का झोपड़ी तारा

न इसका सुख, न उसका कारा

उत्सव में श्री है जीवन राग का

सितारों में उन्मत सजना है,

मैं दीप ! जलते ही रहना है।

 

घर की चौखट पर जगमग हूँ

धरा की हर आँगन, पगपग हूँ

नव प्रकाश रव, नव उमंग हूँ

अमर कृतियों का यश दर्पण

ले दीप्ति प्रभा आलोक चलना है,

मैं दीप ! जलते ही रहना है

 

खुशियों का लिए तराना गाए

नफरत की टहनी भी गाना गाए

नवीन सृजन का लौ झुम के आए

स्नेह, प्रेम, बंधुत्व, राष्ट्र पताका

लिए उजाला का गहना है,

मैं दीप ! जलते ही रहना है।

सुरेन्द्र प्रजापति

 

जगमग दीपक, पगपग उजाला

आज अमृत बनेगा हर-हर हाला,

नेह की बाती, समर्पण की उमंग

उमंगों में गाए रागिनी मतवाला।

 

आँगन की तुलसी में, आशा जला

प्रकाशित मन, जो उदासी में पला,

श्री वैभव का हर दर ज्योति से भरे

दीया-अश्व तिमिर साधने को चला।

 

उमंगों और खुशियों का मेला लगा

कौन है ? प्रभा से जो दृगों को ठगा,

आशा कि किरणें, सुमधुर राग में

किया अभिवादन, लौ भी हर्षाने लगा।

 

सुरेन्द्र प्रजापति

 

फिर से दीप जला देना

 

जो बुझ चुका है दीप उसे

आज फिर से उसे जला देना,

निष्प्राण पड़ चुका अंतर्मन

अमर स्वर से उसे जगा देना।

 

वह अग्नि में दाह नहीं है

जो जला दे मिट्टी का तन,

वह तेज में ज्वाल नहीं है

जो सुला दे हौसले का मन।

 

हृदय का सितार सृंखलित हो

रागिनी, किरण राग सजा देना

आज फिर से उसे जला देना।

 

तुम नवीन प्रभा भरो जीवन में

तिमिरमयी कठोर अंध सघन में

नवीन स्फूर्ति में अहो ! नहाओ

सुख स्वप्न के हर हर नंदन में

 

आज दिवाली, जगा जगत को

हर घर उपवन जगमग कर देना

आज फिर से दीप जला देना ।

 

मैं दीर्घ अंधकार में पलने वाला

उत्सव ज्योति की प्यास मुझे है,

वात मचलता प्रणय तूफान में

उदित शक्ति पर विश्वास मुझे है।

 

निर्मल स्नेह से आंखों का जल

नव विभा दे तुम गिरा देना

आज फिर से दीप जला देना

 

तुम तिमिर भेदना, नवीन रचना

करने को, उन्मत मैं आऊँगा,

कल प्रलय का प्रहार  रोकने

आँधियों से लड़ने मैं जाऊँगा।

 

आज आभा का अभिनन्दन है

दे उजियाला ! घूँट पिला देना

आज फिर से दीप जला देना।

 

सुरेन्द्र प्रजापति

 

दीपक एक जला दूँगा

क्यों जलाऊँ, मैं दीप प्रिय

वीरान तटों पर पलने वाला,

घोर निशा के सघन कक्ष में

सौ-सौ पीड़ा से छलने वाला।

 

है खुशी का उन्माद हृदय में

जहाँ निराशा के शुल मिले,

ईर्ष्या की जलती ज्वाला में

वेदना के निर्मम फुल खिले।

 

जला दीप था कभी आँगन में

शोणित तूफान ने बुझा दिया,

आशा की प्रज्वलित दीप्ति को

दृग के आँसू ने सुला दिया ।

 

मैं विवश अजीर्ण द्वार पर

खोलो-खोलो प्रकाश सखे,

थोड़ी उमंग बच्चा लाया हूँ

रचने को  इतिहास सखे ।

 

नहीं यश सुकृति मुझे चाहिए

चाहिए स्नेह का नुतन आग,

न्योछावर कर दूँगा, बावरी !

मिले जो जोत का निर्मल राग।

 

नव जीवन ने पंख पसारा

लहरों पर प्रेम उगा लूँगा,

तुम देना एक शिखा सुंदरी

मैं दीपक एक जला दूँगा।

 

सुरेन्द्र प्रजापति