दोस्तों!
“शब्द सत्ता के शिल्पी” नामक व्हाटसएप समूह में होने वाली
कविता विनिमय विवरण आपके सामने प्रस्तुत है| दिनांक 08 मार्च 2022 को अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर साझा
की गई कविताओं की एक झलक देखिए|
डॉ हिमांशु शेखर
अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस विशेषांक
इस अंक के शब्द शिल्पी
अरूण कुमार दुबे, पटना
डॉ हिमांशु शेखर, पुणे
दीपक चौरसिया, बस्ती
निशा राय, नोयडा
प्रतीक 'भारत' पलोड़ (दर्पण ), बंगलुरु
प्रेरणा पारिश, दिल्ली,
भरत सिंह रावत, भोपाल
मीनू वर्मा, नोयडा
सुजीत उके, पुणे
स्वाति अग्रवाल सिंह, नोयडा
अबला नहीं वो नारी है
धूल नहीं अब शूल है वो
जिस्म नहीं,ना फूल है वो
वो तो
एक चिंगारी है
देख गलत
चिंघाड़ी है
सकपकाए नहीं,ना मौन रहे
जो सही लगे झट
से दे कहे
भिड़ने की ज़ुल्म से तैयारी है
छोड़ दी
हर लाचारी है
दुनिया न समझ बेचारी है
अबला नहीं , वो नारी है।
उसको न रूप बखान पसंद
श्रृंगार उसे
ना दे आनंद
प्रशंसा से अब नहीं बहलती है
अधिकार की माँग वो करती है
जो दोगे
नहीं तो छीनेगी
एक दिन वो फ़लक भी चूमेगी
जो समझा है कमज़ोर उसे
एक दिन अवश्य पछताओगे
मात तुम्हें
वो दे देगी
मलते ही हाथ रह जाओगे
आँखों में निडर हो
देखेगी
अन्याय किया तो टोकेगी
उसको फुसलाना अब मुश्किल
उपहारों पर फिसले ना दिल
छोड़ दी
हर लाचारी है
दुनिया न समझ बेचारी है
अबला नहीं , वो नारी है।
© प्रेरणा पारिश, दिल्ली
हे औरत ! तुझे क्या कहुँ,
तेरी हर बात निराली है !
तू एक ऐसा पौधा है जिस घर रहे,
वहाँ हरियाली ही हरियाली है !!
तेरी शान में सिर्फ इतना कह सकता
हूँ,
तेरी उचाईयो के सामने आसमान भी
छोटा है !
मेरी सिर्फ इतना सा एक पैगाम है|
ऐ औरत, तुझे मेरा सिर झुका कर सलाम है ||
माँ के रुप में बसी एक जन्नत हूो।
लब पे ना आये कभी वो हसरत हो !
तेरे होने से ही है यह कायनात जवान,
तू ज़िन्दगी की बेहद हसीं हकीकत हो
!!
© अरूण कुमार दुबे, पटना
शक्ति और भक्ति का स्वरुप है नारी
दुःख को हराके प्रेम का पर्याय है
नारी
मन शांत इस धरा पे उस ईश्वर का
प्रतिक है नारी
कठिनाइयों से थकती नहीं
आगे बढ़ती रूकती नहीं
कई रूप दिखालाती है वह
हर रूप निभाने से पीछे हटतीं नहीं
जीवन मे नारी ही मंजिल है
वरना बिना मंजिल रास्तो की कोई
हैसियत नहीं
© सुजीत उके, पुणे
रूस और यूक्रेन युद्ध भी, आज नहीं छाया होता,
जेलेंस्की पर पुतिन का हमला ना अब
आया होता,
दोनों में से एक ने भी, नारी स्वरूप पाया होता,
युद्ध विलुप्त ही होते, सबलाओं का जो किला होता,
काश कोई महिला होता !
© डॉ हिमांशु शेखर, पुणे
प्रेमी पुरुष नहीं रोता
रो देती है उसके भीतर की ममत्व,
वह स्त्रीत्व की कला नहीं जानता..
मैं गुहार लगाता हूं
कि आओ मुझे पत्थर मारो
और ले लो मेरे भीतर की रसधार।
पर मेरे प्रिय,
तुम्हें चुभ रही मेरी पुकार
तो अब मैं मौन हूं,
इस जिह्वा को काट देना उचित होगा
जिसके मचल से तुम रूठ गई हो,
पर एक वचन दो
कि मेरे मौन के बाद तुम मौन न
रहना।
आओ सुनो,
अबकी बार मैं नहीं मेरे भीतर बैठा
"तुम" तुम्हें पुकार रहा है।
© दीपक चौरसिया, बस्ती
महिला दिवस पर अभिलाषा
बेशक महिला दिवस मनाया,आज हमारे देश ने।
किंतु मुझे झकझोर दिया है, इस गंदे परिवेष ने।।
लुटती बेटी रोक न पाया, सरकारी आदेश ने।
ज्यों भारत में डेरा डाला, दशकंधर लंकेश ने।।
शहर शहर और गली गली में, होती जब मनमानी है।
महिला दिवस मनाना तब तक, लगता इक बेमानी है।।
महिला दिवस नही हमको अब महिला वर्ष
मनाना है।
पीड़ित और शोषित बेटी को, मिलकर न्याय दिलाना है।।
बेटी को कमजोर नहीं, अब शक्तीबान बनाना है।
मातृशक्ति ही आदिशक्ति है, हमको यह समझाना है।।
जब भारत में नारी की, आंख बहाती पानी है।
महिला दिवस मनाना तब तक, लगता इक बेमानी है।।
कलम थाम कर कलमकार सब, एक परिवर्तन लाएंगे।
बेटी को लक्ष्मीबाई सी, हम पहचान दिलाएंगे।।
रावण जैसे दानव जब फांसी लटकाए
जाएंगे।
लव जेहादी अब नारी पर, नहीं निगाह उठाएंगे।।
रावत नारी पूज्यनीय है,त्यागी है, बलिदानी है।
महिला दिवस मनाना तब तक, लगता इक बेमानी है।।
© भरत सिंह रावत, भोपाल
हे नारी! हे सदा सबल!
हे नारी!
अब रूप धरो
दुर्गा, काली, शतचंडी का,
जग के असुरों का नाश करो
संहार करो पाखंडी का।
तुम बन महिषासुरमर्दिनी,
विनाशिनी हे कपिर्दिनी।
जग में असंख्य हैं रक्तबीज
व शुम्भ निशुंभ के प्राण हरो,
कलुषित विचार को हर लेना
जन जन के हिय में प्रणय भरो।
हे नारी!
हे जगजननी!
तुम सृजनकार हो सर्वश्रेष्ठ,
तुम जन्मदात्री मातेश्वरी
चर अचर जीव में परम ज्येष्ठ।
नारी महान हर रूपों में
भगिनी, भार्या, तनया, माता,
बिन नारी के सृष्टि शून्य
और कोई नहीं जीवन पाता।
तुममें राधा सा प्रीत भी है,
परित्यक्ति, विरह का रीत भी है।
तुम सहिष्णुता की मूर्ति सी हो,
हर क्षेत्र कर्म की पूर्ति सी हो।
हे नारी!
हे सदा सबल!
तुम हो विनम्र
तुम हो प्रबल,
सृष्टि के काज और कर्म
होते हैं तुमसे ही सफल।
तुम हो असीम तुम ही अनंत,
तुमसे ही सृजन तुममें ही अंत।
© दीपक चौरसिया, बस्ती
सूरज जैसा चमको तुम
फूलों सी मुस्कान भी रख
मुरझा कर खिल जाना
यही है प्रेरणा
निरंतर कदम बढ़ाते चल
मुसीबत से कभी ना डर
कर विरोध गलती का
दे आवाज़ अपनी सहन को
ग़म के घनघोर बादल जब आयें
तुम हौसला कभी ना खोना
प्यार की फुहार बन
पंखों को खोल
ऊँची उड़ान भरना
घुट घुट कर मरना नहीं
इरादों को पक्का कर
अपने सपने ज़रूर बुन
साथ मिले न मिले
तू अटल रह आगे बढ़
याद रख तेरे रूप अनेक
तेरे अरमान कई
तेरे पहचान तू ही बन ॥
© निशा राय, नोयडा
तुम अकेली नहीं…!
नारी तुम अकेली नहीं हो,
असहाय और लाचार नहीं हो।
ममतामई अद्भुत कृति हो तुम,
जीवन रूपी धरातल पर,
इबादत की चीज हो तुम।
नारी तुम कमजोर नहीं हो,
अबला और अनाथ नहीं हो।
आदि शक्ति स्वरूपा हो तुम,
अटूट श्रद्धा और आस्था हो तुम,
मजबूत नींव देश की हो तुम,
घर की आधारशिला हो तुम।
नारी तुम निर्जीव नहीं हो,
गुलाम और बेबस नहीं हो।
विश्वास हो अपनों कि तुम,
जीवन रूपी कठिन सफर में,
एक मधुर एहसास हो तुम।
नारी तुम वस्तु भोग की नहीं हो,
मजबूर और बेचारी नहीं हो।
कर्मठता से परिपूर्ण हो तुम,
जीवन की संचालिका हो तुम।
सृष्टि की पहचान हो तुम।
नारी तुम गुलाम नहीं हो,
अपकृति और दुर्वोध नहीं हो।
एक मधुर श्रुति हो तुम,
सुंदर काव्य के जैसा ही,
उदारता से परिपूर्ण हो तुम।
नारी तुम बाधक नहीं हो,
अभिमानी और विनाशिनी नहीं हो।
अपनों की पालनहार हो तुम,
जीवन के कठिन घड़ी में,
अपनों की तारणहार हो तुम।
नारी तुम अकेली नहीं हो,
पराश्रित और निर्बल नहीं हो।
आत्मविश्वास से परिपूर्ण हो तुम,
अनेक किरदार निभाने वाली,
एक सशक्त ढाल हो तुम।
© मीनू वर्मा, नोयडा
चीर हरण
कल भी बेबस थी.....
कई नारियां,
आज भी रो रही हैं अनगिनत सुता,
कब मिटेंगा कष्ट उसका...
उधेड़बुन में फसी हूं पूरी तरह।
बीत गए हैं कई बरस....
चीर हरण अभी भी है हो रहा।
द्वापर युग में………….
हरण चीर का,
भरी सभा में………….
द्रोपदी का हुआ,
त्रेता युग में…………
अपहरण सीता का,
पूरी तरह, छल से हुआ।
कल भी शिकार थी, नारी बेबसी की
आज भी...................
तड़प रही हैं कई बुरी तरह।
कब मिटेंगा कष्ट उसका,
कब वह बेखौफ होगी पूरी तरह,
क्या निर्भया के दर्द ने……
सुरक्षा व्यवस्था को,
झकझोरा अभी तक नहीं भला,
या अभी भी आंखें बंद कर,
सब हैं सोए पूरी तरह।
धरती मां के सीने पर ही..
चीखती है जब .........
चोटिल हो तनूजा,
देखकर अंबर का भी दिल...
क्या पिघला होगा नहीं भला।
खामोश फिर क्यों है आज...
जनता और जनार्दन यहां,
क्यों बुराई के खिलाफ
आवाज किसी के.........
निकलते नहीं हैं भला।
इतना अत्याचार देख,
कैसे कोई चुप रह जाता है यहां
क्या ईश्वर के प्रहार से,
पापियों को..........
डर नहीं लगता है जरा।
कल भी शिकार थी बेबसी की,
आज भी रो रही हैं कई नंदिता।
कब मिटेगा खौफ,उनका...
कब आजाद होगी वह पूरी तरह,
उधेड़बुन में फंसकर ना जाने,
रो रही हैं कितनी ही सुता।
कौंन है आखिर शत्रु उसके...
खिलखिलाती मुस्कानों का,
कौंन है, जो उसकी.........
प्रगति से जल रहा है पूरी तरह,
कौंन है जो उसे.....
कुरूप बनाना चाहता है,खुद की तरह,
कौंन है जो चाहता है,
करना इस्तेमाल उसे......
किसी वस्तु की तरह।
कल भी शिकार थी,अत्याचार की,
आज भी लाचार है......
कई पूरी तरह।
मजबूरियों में खुद को छुपा कर,
खौफ में जी रहीं हैं.......
आखिर क्यों हमारी आत्मजा,
कल भी शिकार थी बेबसी की,
आज भी रो रही हैं,क्यों कई सुता ???
© मीनू वर्मा, नोयडा
सुलभ
सदियों से अपने
अस्तित्व और सम्मान के लिए
संघर्ष और प्रयास करती नारी।
कभी दौड़ कर पहाड़ चढ़ती,
तो कभी तैर कर समुद्र पार करती।
कभी एक छलांग में चाँद पर कदम रखती,
तो कभी करोड़ों का नेतृत्व करती।
कभी साहित्य को नए आयाम देती,
तो कभी वायुयानों को गतिमान करती।
क्या अपनी कीमत बढ़ाते-बढ़ाते,
इतनी सस्ती हो गई?
कि एक इत्र की सुगन्ध से,
इतरा कर निकट आ जाती है!
कि एक पुरुष के अन्तः वस्त्रों के
रंग-रूप से,
उसका अन्तःकरण डोल जाता है!
कि एक चमकती गाड़ी से,
उसकी आँखों में सितारे चमकने लगते
हैं!
कि एक साबुन की सुगन्ध,
उसे अपने सुहाग से अधिक आकर्षक
लगती है!
कि एक चलचित्र का टिकट,
उसके चरित्र को चलायमान कर देता
है!
कि मदिरा का एक प्याला,
उसे मादक और अनियन्त्रित कर देता
है!
और यदि ये सब
असत्य और भ्रामक है।
तो क्यों विश्वव्यापी प्रबल
नारीवाद,
इस प्रचलित भौंडेपन का,
एक स्वर में विरोध नहीं करता?
या यूँ समझें कि
दुर्लभ गुणों की धनी नारी,
पुरुष के लिए उत्तरोत्तर
सुलभ होती चली गई।
© प्रतीक 'भारत' पलोड़ (दर्पण), बंगलुरु
जब सीताएं परित्यक्त ना होंगी,
जब द्रौपदियां निर्वस्त्र ना होंगी,
मिलेगा उनको इज्ज़त सम्मान,
रह पाएगा महिला दिवस का मान,
माएँ बहनें
बहू बेटियाँ
भयमुक्त हो जब जी सकेंगी,
बना पाएँगी अपनी पहचान,
जब कथनी ही नहीं करनी में भी
महिलाओं का होगा उत्थान,
जागेगा उनका आत्मसम्मान,
रह पाएगा महिला दिवस का मान।
© प्रेरणा पारिश, दिल्ली
मनमर्ज़ी से
मनचाहे मौसम
मंजरी खिलती है
लड़की की भी
मर्ज़ी पूछो
मिज़ाज समझो
लहराने दो…
बनेगा समाज
सुंदर-संतुलित
मनमोहक बाग सा