दोस्तों!
“शब्द सत्ता के शिल्पी” नामक व्हाटसएप समूह में होने वाली
दैनिक कविता विनिमय विवरण आपके सामने प्रस्तुत है| आज “प्यार की फुहार” पर साझा की
गई कविताओं की एक झलक देखिए|
डॉ हिमांशु शेखर
प्यार की फुहार :शब्द शिल्पी
प्राणेन्द्र नाथ मिश्र
सावन 'विथयाथिल'
प्रेरणा पारिश
मीनू वर्मा
विनीता शर्मा
अरूण कुमार दुबे
राकेश वर्मा
अमन कुमार विश्नोई
सुप्रिया पाण्डेय
सुरेन्द्र प्रजापति
सतीश चन्द्र भगत
राही राज
भरत सिंह सोलंकी
राजनीति और नेता
तुम राजनीति बन जाओ प्रिये
मैं नेता बन तुम्हें प्यार करूं
झूठे वादों के महलों में
लंबी बातें दो चार करूं।
हों पांच साल, बासंती दिन
सुंदर नोटों की माला हो,
उजले कपड़ों के भीतर ही
कुलबुल करता मन, काला हो।
जो बात कहें सत्ताधारी
उसका विरोध हर हाल करें,
गुमराह करें लोगों को हम
और खुद को मालामाल करें।
हे प्रिये! देश की चिंता क्या,
यह हो अखंड या खंडित हो
तुम रहो, रहूं मैं और पैसे
है मूर्ख ये जनता, दंडित हो।
प्राणेन्द्र नाथ मिश्र
संगिनी
सज-धज उतरी चाँदनी मेरे आँगन में,
सपनों से सजी
डोली, प्यार आँखों मेंl
दिल की
उमंग ; आँखों की प्यास वों,
कर्ण मधुर उसकी वाणी - अजी सुनते
होl
देखा उसे तो
ऐहसास हुआ,
इश्क खुदा की अनमोल दुआ हैl
आँखों में
झील, अर्ध प्यास
है,
सावन भी तरसे वो बरसात है।
ओस मे सिमटी ठंडी साँस हैं,
बादलों से खेलती हवाओं की बारात है।
बाहों में सिमटी चाँदनी रात है,
लम्हे भी तरसे वो मुलाकात है।
चाहा उसे तो यक़ीन हुआ,
शमा भी जल जाए वो हसी अंदाज हैl
मन्नतें मांगे जिनसे वो मुरत पास
है,
कोयल भी तरसे वो नशीली आवाज हैl
रैना सो गई हमे उसमें खोया देख,
ऐसी हसीन वों सर्दी की रात हैl
संगमरमर भी जिसे छुअन को तड़पे,
प्रेम, सौंदर्य की वो हसीं ताज हैंl
पूजा उसे तो यकीन हुआ,
संस्कारों की लालिमा माथे पर,
खुशियो की थाली
लिये हाथो में,
दुआओं से सुसज्जित वो मंदिर साथ
हैंl
वों विदुषी, संतोषी , सुहासिनी
सपनों की पथ प्रदर्शित रोशनी,
मैं सदैव दास उस देवी की ,
वों जीवंत प्रीतमय संगिनी ।।२।।
सावन 'विथयाथिल'
सरगम
(१)
बंसी की सरगम
पायल की झंकार,
कान्हा का सम्मोहन
राधा का अनुराग,
नाचत है राधा
नचावत है श्याम,
मुग्ध हो सृष्टि देखत
पवित्र दोनों का प्यार,
दृश्य ये अलौकिक
जगत हो आलोकित,
धुन बंसी की सुन
चहुंदिस हो आनंदित।
(२)
सांसों की सरगम पे
धड़कन का गीत,
कण कण में प्रकृति के
बिखरा है संगीत,
नदिया की कलकल
या चिड़ियों का गान,
गोरी का नर्तन
या बंसी की तान,
भंवरे की गुंजन
या पायल की रुनझुन ,
बच्चों की खिलखिलाहट
या कदमों की आहट,
सांसों की सरगम पे
धड़कन का गीत,
कण कण में प्रकृति के
बिखरा है संगीत ।
मंदिर की हो घंटी
या पत्तों की सरसराहट,
गान मांझी का
या के बारिश की आहट,
कोकिल की कूक
या पपीहे की हूक ,
दिल की धकधक हो
या चूल्हे की फूंक,
सांसों की सरगम पे
धड़कन का गीत,
कण कण में प्रकृति के
बिखरा है संगीत।
प्रेरणा पारिश
ये प्यार क्या है?
एक एहसास है या
एक अंदाज है।
जीने की वजह है या
मौत का आगाज है।
सोच में हूं...
क्या कहूं....
ये प्यार क्या है?
हसीन कोई ख्वाब है या
दुखों की बरसात है।
मेहरबानी है खूबसूरत पलों की या
उमरता हुआ गमों का सैलाब है।
क्या कहूं.....
ये प्यार क्या है।
सजा है प्यारी गलती की या
कोई हंसी फरियाद है।
टूटे दिलों की दास्तान है या
खूबसूरत सपनों का संसार है।
क्या कहूं.....
ये प्यार क्या है।
खुशी की वजह है या
दुखों का अंबार है।
उम्मीद है सुनहरे भविष्य की या
टूटा हुआ कोई अरमान है।
क्या कहूं ....
ये प्यार क्या है।
धड़कन से जुड़ा है या
बनावट ही इसका अवलंब है।
क्या कहूं....
ये प्यार क्या है।
दिल से जुड़ा है या
दिखावा ही इसका आधार है।
गमों से भरी दास्तान है या
खुशी का पारावार है।
क्या कहूं....
ये प्यार क्या है।
छुपी हुई अनुभूति है या
जिंदा दिलों की पहचान है।
घुटन है अजीब सी या
खुला हुआ आसमान है।
क्या कहूं.....
ये प्यार क्या है।
खूबसूरत एहसास है या
धोखा इसमें अपार है।
क्या कहूं ....
ये प्यार क्या है?
मीनू वर्मा
धड़कन
दिल में धड़कते हो,
मेरी धड़कन बनकर,
संभाल लेते हो मुझे,
हौसला मेरी बनकर।
जीवन की राहों को,
आसान बना जाते हो,
मेरी हिम्मत बनकर।
समझते हो मुझे इतना,
जितना मैं खुद को
पहचान पायी नहींअभीभी।
परवाह करते हो इतनी,
कोइ गम करीब मेरे,
आ ना सका कभी भी।
प्यार करते हो इतना....
सागर भी चाहे तो,
समा जाए जब भी।
हर पल साहस बनकर,
साथ मेरे नजर आते हो,
कभी रक्षा कवच कभी मेरी,
ढाल बन जाते हो।
कठिन राहों को हमेशा
आसान बना जाते हो,
उदासी को मेरी पल मे
मुस्कान बना जाते हो।
दूर होने पर भी हमेशा,
करीब दिल के नजर आते हो,
धड़कन बनकर मेरी,
मेरे यादो में बस जाते हो।
बेइंतहा चाहत तुम्हारी,
मेरी मोहब्बत से कही ज्यादा है,
मेरा प्यार तुम्हारी चाहत से,
हमेशा कम ही पड़ जाता है।
साथ पाकर बस इक तेरा,
दिल धड़कता है मेरा,
बिछड़ने का सोचकर भी,
कांप उठता हैं मन मेरा,
कठिन रोहों में जीवन की,
दूर हो जाओगे मुझसे जिस घड़ी,
उसी पल थम जाएगी,
मेरे दिल की धड़कन भी।
मीनू वर्मा
वैलेंनटाइन – डे चुटकियां
आ गए नए- नए डे,
रोज डे,टैडी डे,चाकलेट डे,
मदर्स डे, फादर्स डे……..
ना जाने कौन -कौन से डे,
हम तो सीखे संडे,मन डे,
…………..मन से रोज रहा मंडे[सोमवार]
क्योंकि हमें है साहित्य और रसोई
से प्यार,
हमारा बेलन ही है वैलेंन टाइन,
हे ईश्वर रोटी मिले आन टाइम,
औरतों का है सबसे बडा शस्त्र,
जिन पर हुआ प्रहार आज भी हैं
त्रस्त,
हे प्रभू रोटी के अतिरिक्त बेलन को
किसी पर न धुमाऊं,
परिवार में एकाकार हो जाऊं,सबको खुश रख पाऊं,
साहित्य तथा लेखनी में डूबकी लगाऊं,
उसकी सुगंध से ओत-प्रोत हो जाऊं,
शेर -शायरी,साहित्यकारों ,सहयोगियों के साथ कहकहा लगाऊं,
रोज बेलन- औन – टाईम मनाऊं,
बेलन और रसोई को न भूल पाऊं,
राज की बात राज ही रख पाऊं,
खुद को खुश रखूं, माहौल खुशहाल बनाऊं
विनीता शर्मा
साँझ का दीपक
साँझ का
दीपक,
पिया तेरे
नाम।
मैं जलती रहूँ
तुझमें,
हर दहक
तेरे नाम।
एक छोर धड़कन की तुम,
और एक
छोर मैं।
बीच दूजे
जलती रातें,
कुछ ख़्वाब
कुछ यादें।
तुम श्याम मैं
बांसुरी,
तुम जुगनू
मैं रोशनी।
तुम बिन
मैं अधूरी,
सिल दें लब प्यार की।
नज़रों में
नज़रों का,
मदहोश गुल
खिले।
साँसों की सर-सराहत,
एक दूजे का हम सुने।
एहसासों के शोर तले,
बाँहों की चादर ओढ़े।
चल क्षितिज तक संग,
एक दूजे
में खोए।
साँझ का दीपक,
पिया तेरे
नाम का।
आशिकी सी
है धड़कन,
जब से राधा बनी श्याम का।।२।
सावन 'विथयाथिल'
अपने ही रंग मुझे रंग दे
तन भी रंग दे, मन भी रंग दे,ओ रंगरेज !
अपने ही रंग मुझे रंग दे,
सात रंग जीवन के अंग
हर रंग से मुझको रंग दे,
मुझे रंग दे ओ रंगरेज!
अपने ही रंग मुझे रंग दे।
आया बसंत, रुत मस्त मलंग
बाजे मृदंग,कोकिल की तरंग,
सरसों पीली,उड़ती तितली
अलबेली पवन,मादक मौसम
पीत रंग में,अपने ही ढंग में,
मुझको भी तू रंग दे,
तन भी रंग दे,मन भी रंग दे,ओ रंगरेज !
अपने ही रंग मुझे रंग दे,
सात रंग जीवन के अंग
हर रंग से मुझको रंग दे।
सावन आया,बादल छाया
बरसी बूंदें, मनवा झूमे,
आजा हम तुम भीगें जी भर
तृप्त हृदय ये कर लें,
मुझको भाए हरा रंग पिया
इस रंग ही मुझको रंग दे,
तन भी रंग दे,मन भी रंग दे,ओ रंगरेज!
अपने ही रंग मुझे रंग दे,
सात रंग जीवन के अंग
हर रंग से मुझको रंग दे।
तुझ से है प्रीत
ओ मेरे मीत,
लाल रंग मुझे रंग दे,
लाल चुनरिया ,लाल ही चूड़ी
मांग में लाली भर दे,
तन भी रंग दे, मन भी रंग दे,ओ रंगरेज!
अपने ही रंग मुझे रंग दे,
सात रंग जीवन के अंग
हर रंग से मुझको रंग दे।
प्रेरणा पारिश
मुझे देखकर वो आज हँसी,
मुझे लगा की वो प्यार में फँसी।
हँसी उसकी इतनी प्यारी की,
उसकी हँसी पर मेरे दिल की धड़कन
रूकी।।
उसकी हँसी थी कुछ शरारत भरी,
हँस के वो मेरी ओर बढ़ी।
कुछ कहना था उसको शायद,
वो बिन कहे ही कुछ दूर तक चली।
हँसी हँसी में बात इस हद तक बढ़ी,
कि हमदोनों एक-दूजे में खो गए।
मेरे और उसके दरम्यान आकर्षण ऐसी
बढ़ी,
कि अब हमदोनो एक-दूजे के हुए।।
अरूण कुमार दुबे
गजल
खुद को इतना भी मत बचाया कर
बारिशे हो तो भीग जाया कर
चाँद लाकर कोई नहीं देगा
अपने चेहरे से जगमगाया कर
दर्द हीरा है दर्द मोती है
दर्द आँखों से मत बहाया कर
काम ले कुछ हसीन होंठो से
बातो-बातो मे मुस्कुराया कर
धूप मायूस लौट जाती है
छत पे कपडे सुखाने आया कर
कौन कहता है दिल मिलाने को
कम से कम हाथ तो मिलाया कर..
राकेश वर्मा
चलता रहने दो मियाँ सिलसिला
दिलदारी का
आशिक़ी दीन नहीं है कि मुकम्मल हो
जाए।
हालत-ऐ-हिज़्र में जो रक़्स नहीं कर
सकता,
उस के हक़ में यही बेहतर है कि पागल
हो जाए ।।
यूँ ही ख्याल आता है बाँहों को देख
कर,
इन टहनियों पे झूलने वाला कोई तो
हो।
इश्क़ करनेवाले क्या खुशनसीब होते
हैं?
कोइ मेरे हुनर पर भी मरनेवाला तो
हो।।
हम इस उधेड़बुन में मोहब्बत न कर
सके,
ऐसा कोई नहीं मगर ऐसा कोई तो
हो।
मुश्किल नहीं है इश्क का मैदान
मारना।
लेकिन हमारी तरह निहत्था कोई तो
हो।।
अरूण कुमार दुबे
दोस्त ये कम्बख्त इश्क़ इश्क़ नहीं
एक मर्ज है
और जिस मर्ज में हो मज़ा उसे लेने
में क्या हर्ज है
अमन कुमार विश्नोई
उसके लिए सब कुछ किया तुमने
सब नखरे सहे तुमने
उसे सब कुछ दिया तुमने
हंस हंस के बातें की
फूलों भरी राहें दी
प्यार भरी यादें दी
जाहिर होने से पहले हर ख्वाब बसाया
चुन चुन कर उसमे रंग सजाया
उसे दिल में ज़िन्दगी में निगाहों
में पनाह दी
उसने तुम्हे पाया
तब कहते हो इतराते हो
की उसे प्यार बहुत है तुमसे
जिसे नज़र भर कभी देखा नहीं
दो प्यार के बोल कभी बोले नहीं
तुम्हारी एक नज़र को जो तरसी हो
रो रो आँखे बरसी हो
जिसके रोम रोम में तुम बसे हो
फिर भी तुम्हे न पा सकी हो
जिसे हर पल नज़र अंदाज़ किया
जिसके प्यार का भी अपमान किया
जिसकी आस भी नहीं छोड़ी तुमने
फिर भी किसी जरोखे पर
जो तुम्हारी बाट तकती हो
कभी सोचा है
वो तुमसे कितना प्यार करती है?
सुप्रिया पाण्डेय
निलकुसुम
निलकुसुम
सिर्फ खिल ऊठा था
जीवन के बसंत के साथ
लेकिन
प्रेम का मिठास नहीं था
कोई फुहार नहीं
कोई बहार नहीं
न प्रतिरोध, न गन्ध
लेकिन क्षितिज पर
देखा गया, जब प्यार का
जबरन आलिंगन
जज्बात की बंदिश
लहूलुहान आत्मा की आवाज
और तब तुमने
प्रतिरोध को आमंत्रण दिया
बंदिशों की लक्ष्मणरेखा तोड़कर
रक्तकुसुम की पंखुड़ियों को
चुम्बन का निमंत्रण दिया
ताकि-
भावी स्मृतियों में भी
प्रेम में खिलता रहे
निलकुसुम।
सुरेन्द्र प्रजापति
खुद से प्यार करना होगा
असफलता से बिना डरे,
सतत आगे बढ़ना होगा,
खुद से प्यार करना होगा।
कठिन पलों में भी तुम्हें...
निश्चित ही संभालना होगा।
हर दिन कीमती है बहुत
हर पल का उपयोग तुम्हें..
करना होगा।
त्याग, सुख के सेज का करके.....
परिश्रम को तुम्हें....
हथियार बनाना होगा।
हर बाधा को पार करके..
मंजिल को तुम्हें पाना होगा।
स्वयं पर विश्वास करना होगा।
हार से निराश न होकर..
प्रयास जीत का तुम्हें सदा ही
करना होगा।
विश्वास स्वयं पर बनाए रखकर...
आंकना खुद को.....
कभी कम नहीं होगा।
अग्निपथ पर चलने का भी.....
सदैव आनंद उठाना होगा।
खुद पर भरोसा करना होगा।
दूसरों से द्वेष किए बगैर,
खुद का मनोबल बढ़ाना होगा,
स्वयं से प्यार निभाना होगा।
अपनी कमियों को दूर....
स्वयं ही तुम्हें करना होगा।
हिम्मत से अपने कदमों को...
प्रगति पथ पर बढ़ाना होगा।
डर और घबराहट को छोड़कर...
सतत प्रयासरत रहना होगा।
स्वयं पर विश्वास रखना होगा।
ज्ञान को अपना आधार बनाकर...
उम्मीद का दीपक.
दिल में अपने जलाना होगा।
कांटो भरे पथ पर भी.....
आनंद से आगे बढ़ना होगा,
विफलता से बिना घबराए,
निरंतर आगे बढ़ना होगा..
खुद से प्यार करना होगा।
गया माघ,कुहासा लेकर
फागुन आया, वसंती हवा में
पेड़ों की हंसमुख नव पल्लव
गुलाबी खुशबू लिए फुनगी से
चिड़ियों की चह- चह से
बदला है मौसम गया माघ
कुहासा लेकर, फागुन आया |
फगुनहट सबके चेहरे पर छाया
तापमान धीरे- धीरे चढ़ रहा
स्वेटर, कोट रजाई शर्माया
कोराना को भारत वासी
धक्का मुक्की से दूर भगाया |
वसंती हवा सबके कानों में
कुछ- कुछ धीमे से बतिया कर
तेजी से संदेशा देकर आगे- आगे
गली-गली में शोर मचाया
गया माघ कुहासा लेकर
फागुन आया! फागुन आया!
धरती माता पुरवा- पछुआ
हवा वसंती में हर्षित होकर
मन ही मन गुनगुनाते भौरें
सब पेड़ों पर जा- जाकर
कहा उठो- उठो गया माघ
कुहासा लेकर, फागुन आया |
सतीश चन्द्र भगत
तुम कौन हो ? बोलो... हे अदृश्य!
तुम निशा विहीन, चंद्रमा सी
दिखती तो नहीं पर, आसपास,
क्यों खेल रही हो व्याकुल कर
पुलकित करके, देकर आभास।
तुम सावन की हो प्रथम बूंद
या मुक्त पवन की लोरी हो?
तारों को छूकर आती हुई
या चंद्रप्रभा की गोरी हो?
कल्पना लोक मे बैठा मैं
चहुं ओर देखता हूं तुमको,
तुम नीर बनी बह जाती हो
छूकरके निमिष भर ही मुझको।
हो समा रहे सांसों के सदृश
फिर क्यों विलीन हो जाते हो ?
छू कर के प्राण, बोलो.. अदृश्य!
कैसी भाषा समझते हो ?
मैं प्रेम पाश मे बंध करके
विह्वल होता, हे आनंदिता!
निर्झर कर दो अब प्रणय - वृष्टि
बुझ जाए प्रेम की प्रणय - चिता!
एक गुलाब
मेरे प्रियवर , मेरे दिलवर ,
कुछ मुहब्बत तो होने दो ,
नेह स्नेह को चलने दो ,
ईश्वर की असीम कृपा है ,
इस जीवन को खिलने दो ।
आधा जीवन बीत चुका है ,
गजब का समय आ गया है ,
तुम मोहन हो ,मनमोहन हो,
मनभावन हो और प्रीतम हो ,
अब प्रीत की वर्षा होने दो ।
एक गुलाब ही तो मांगती हूँ ,
जुड़े में सजाना चाहती हूँ, ,
दिल में बसाना चाहती हूँ ,
नहीं चाहिए धन और दौलत ,
बस प्रेम समर्पण चाहती हूँ ।
कितने साल बीत गये हैं ,
तन का मिलन भी हो गये हैं,
अब मन का मिलन जरूरी है ,
यह मजबूरी नहीं ,
हमदोनो के लिए जरूरी है ।
राही राज
हो स्वामी प्रेम के गीत बजा ले रे
चंदन की बाँसुरिया मेरी अधर लगाले
रे।
ठुमक ठुमक कर करें कन्हैया लीला
न्यारी न्यारी। बालसखा संग नाचे गाए हर्षित हों नर नारी।
हो लल्ला पैजनियाँ बजा ले रे
चंदन की बाँसुरिया मेरी अधर लगाले
रे--।
यमुना तट पर बंजर भूमि छोड गया
रखवाला
दूध दही की कमी नहीं यहाँ कहाँ है
मोहन ग्वाला। हो मधुवन अपनी गाय चराले रे
चंदन की बाँसुरिया मेरी अधर लगाले
रे--।
रिमझिम रिमझिम बारिश बरसे कोयल कूँ
कूँ गाये
सूखा है सावन में तन मन हिय में आग
लगाये ।
हो माधव प्रेम की फसल उगा ले रे
चंदन की बाँसुरिया मेरी अधर लगा ले
रे--।
सूने महल अटारी सूनी सूनी सेज
सयानी।
सूना सूना लगे वृंदावन रूखी सबकी
बाणी।
हो प्रियतम गीत मधुर सा गालेरे
चंदन की बाँसुरिया मेरी अधर लगा ले
रे--।
कुसुम सरोवर कमल खिले हैं प्रेम
उमंग उपजाए।
जोह जोह बाट राधिका हारी कान्हा
कान्हा गाये।
हो गिरधर राधा को अपना ले
चंदन की बाँसुरिया मेरी अधर लगा ले
रे--।
भरत सिंह सोलंकी
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