मंगलवार, 15 फ़रवरी 2022

शिल्पी संवाद भाग 012

दोस्तों!

“शब्द सत्ता के शिल्पी” नामक व्हाटसएप समूह में होने वाली कविता विनिमय विवरण आपके सामने प्रस्तुत है| दिनांक 14 फरवरी  2022 को पुलवामा हमले को याद करते हुए वैलेंटाइन दिवस पर साझा की गई कविताओं की एक झलक देखिए|

 

डॉ हिमांशु शेखर


 

इस अंक के शब्द शिल्पी गण

 


डॉ हिमांशु शेखर, पुणे

निशा राय, नोयडा,

प्राणेंद्र नाथ मिश्र, कोलकाता

प्रेरणा पारिश, दिल्ली

मीनू वर्मा, नोयडा

सुलेखा कुलश्रेष्ठ, बेंगलुरू

स्वाति अग्रवाल सिंह, नोयडा


 


 

वैलेंटाइन हफ्ता

(चौपाई छंद: 16 मात्रा, अंत वाचिक गागा)

 

अंग्रेजी का हफ्ता प्यारा

बेलन टाई न्यारा सारा।

बैल इन टाई नहीं गाया

ऐसा ना कभी समय आया।

 

बैल और बेलन साथ चले

टाई दोनों के साथ फले।

ना शादी ये बरबादी है

बढ़ती केवल आबादी है।

 

मना रहे कह प्यार का

ना मौका ये त्योहार का।

गुलाब और प्रस्ताव दूर से

उपहारों का दाँव दूर से।

 

करे प्रतिज्ञा ना छूएंगे

बैल को ऐसे ही दुहेंगे।

वो पाँच दिनों तक दूर रहे

फिर मर्यादा को चूर कहे।

 

वैलेंटाइन ना प्यारा है

बेमतलब करे खसारा है।

ना हफ्ते का कुछ नारा है

पश्चिम का कूड़ा सारा है।

 

प्यार ना खट्टे अंगूर हो,

मना रहे अभी लंगूर जो।

शेखर कहता निजता खोजो

इसको ना भारत में पूजो।

 

© डॉ हिमांशु शेखर, पुणे

 

 

 

 

 

एक व्यंग्य : नई बोतल में पुरानी वाईन

 

रोज़ डे से सफ़र शुरू जो

ब्रेक अप डे पर अंत हुआ,

प्यार था या था खेल कोई

टूटा रिश्ता, संत की ये दुआ!!

प्रपोजल और ब्रेक अप के दरमियाँ

और भी आए  पड़ाव

उड़ते फिरे प्रेमी गगन पर

दो पल का ही था पर लगाव,

फूल,चॉकलेट,टेडी देकर भी

कहाँ निभा पाए थे प्रॉमिस !

कहते दोष है कहां हमारा

वक्त ही की तो है साज़िश,

गले लगाकर चूमा पहले

थप्पड़ लगा फिर किक किया

ऐसा प्यार ना देखा जाना

माइंड को है सिक किया,

इत्र  सुंघा  फुसलाया पुनः

ग़लती मानी ,पकड़े कान

लाख जतन उपाय कितने ही

ब्रेक अप हुआ पर , शून्य परिणाम,

दूजे साथी की ख़ोज करें अब

नया फिर से प्रयोग करें सब,

विल यू बी माय वेलेंटाइन

आई एम वही

नई बोतल में  पुरानी वाईन।

 

© प्रेरणा पारिश, दिल्ली

 

पुलवामा हमला

 

याद दिलाने चौदह आया,

फरवरी वही दिन ले आया।

याद करो हमला पुलवामा,

सेना पर आतंकी जामा।

 

विस्फोटक गाड़ी पर लाए,

टक्कर कर विस्फोट कराए।

यही हमला था कायराना,

मिले शहादत का नजराना।

 

दुखी दग्ध उत्तेजित होता,

दिल में बिन आंसू के रोता।

खून खौल ऊठा भारत का,

बदला लेना कर गारत का।

 

तभी हवाई हमला साधा,

बालाकोट पे ना कोई बाधा।

मार मार के पाठ पढ़ाया,

भारत का परचम लहराया।

 

तभी समझ में जग को आया,

लड़ने में ये अव्वल आया।

यही शांति का बड़ा पुजारी,

मगर नहीं कायर है भारी।

 

पुलवामा का चावल केसर,

बदली है पहचान कलेवर।

आतंकी को मार भगाए,

हमला का पर्याय बनाए।

भारत का परचम लहराए,

आँख आँख के बदले पाए।

याद करो हमला बेगाना,

बदला लेना ही ये ठाना।

© डॉ हिमांशु शेखर, पुणे

 

प्रणय दिवस पर - एक आवाज़

 

किसने कहा?

...किसने कहा??

ओह,, यह आवाज़

तो आ रही है...

घाटियों से ---

 

"यह प्रणय दिवस है...?

एक गुलाब मुझे भी दो!

लाल गुलाब,,,सिर्फ लाल!"

 

गूंज गई

44 मुस्कुराहट भरी

कराहती आवाज़ें

अपने अपने घरों में बैठी

निरीह

आसमान को ताकती

उन पत्नियों के कानों में

जिनका लाल रंग

छूट गया था आज

जीवन के बिखर गए थे साज

 

वे पूछ बैठीं

"कैसे दूं लाल रंग?

जो तुम ले गए अपने संग

मैं हूं लिपटी, श्वेत वस्त्रों में

तुम्हें लाल ही क्यों भाता है

क्या तुम्हें मेरा

सफेद वस्त्र

नज़र नहीं आता है...?"

 

पीड़ा से कराहती आवाज़

खिलखिला गई, बोली-

"हे प्रिये!

मुझे लालिमा ही भा गई

इसी रंग से मुझमें

अबध्यता आ गई

 

मैने

लाल, रक्त रंजित देह

किया है भारती मां को समर्पण

और अब

अमर हो जाने पर

बार बार दिखता है

उसी रंग का दर्पण।

 

यह रंग

हम सैनिकों को

बहुत भाता है

क्योंकि, यही रंग

देश की रक्षा कर पाता है।"

 

© प्राणेंद्र नाथ मिश्र, कोलकाता

 

 

नमन

 

भिंगोकर वर्दी को अपनी,

रक्त से अपने.......

देश के नाम कर गए,

शहादत वे अपनी।

ना सोचा अपने बारे में,

ना घर वालों के बारे में,

कुर्बान कर गए वे हर कतरा...

लहू का अपनी।

ना घबराए तनिक,

ना पीछे किए कदम अपनी,

अर्पण कर गए वे......

स्वदेश के नाम पर,

दिलों जान अपनी।

चीख निकली पीड़ा से,

छल्ली हो गई काया उनकी.....

आखरी सांस तक हिम्मत का,

ना छोड़ा..............

दामन उन्होंने अपनी।

घायल तन के सहारे.....

लड़ते रहे वे पल-पल,

निस्तेज ना हो गई जब तक,

सबल, दृढ़............

काया उनकी अपनी।

मांग सूनी कर.....

सहधर्मिणी की अपनी,

न्योछावर कर गए वे...

देशाभिमान पर,

जिंदगी अपनी।

                 

© मीनू वर्मा, नोयडा

 

चौदह फरवरी

 

मिला नहीं जो प्रेम कह रहे,

वैलेंटाइन मनाएंगे,

मिले नहीं महबूबा तो हम,

देश पे मिटने जाएंगे।

प्यार करो तब अदला बदली

नहीं बीच में लाएंगे,

नहीं रहे मोहताज दिवस का

वैसा प्रेम निभाएंगे।

फूल और उपहार हमेशा ही

मुरझाते जाएंगे,

प्यार सरीखा नश्वर हो जो

वैसे दीप जलाएंगे।

लाल रंग से प्यार हमेशा

आगे लाते जाएंगे,

हो गुलाब या रक्त बहे पर

जीवन को महकाएंगे।

हो सुहाग की लाली जैसा

वही साथ मनाएंगे,

बलिदानी का जज्बा लेकर

प्रेम सदा निभाएंगे।

शेखर का कहना इतना है

चलो मनाने जाएंगे,

देश धर्म को ऊपर रखकर

दिन ये आज बिताएंगे।

 

© डॉ हिमांशु शेखर, पुणे

 

कान्हा के प्यार में होकर पागल

मीरा थी जोगन कहलाई,

प्रेम की पराकाष्ठा अपने

त्याग और समर्पण से पायी,

प्रीत तो थी उसकी पूजा

कृष्ण कृष्ण,कोई ना दूजा

मिसाल ऐसे प्रेम की तो

मुश्किल है कलयुग में पाना,

आधुनिक प्रेमी जोड़ों ने तो

प्रेम को दिखावा भर जाना,

फूल,उपहार,सार्वजनिक प्रदर्शन

जीवन का उनके ये दर्शन,

पागलपन हासिल करने का

ख़ुद को सफ़ल साबित करने का,

शिद्दत प्रेम में रही कहाँ

इतना भौतिक जो हुआ जहाँ ।

 

© प्रेरणा पारिश, दिल्ली

 

 

ये तो प्यार है

क्षणभंगुर हो या

अपूर्ण जीवनपर्यंत

पर स्वीकृत हो

हीर-रांझे,लैला-मजनू

मजबूर ना हों

आज हो कल ना हो

असली या नक़ली हो

वंश मर्यादा की बलि ना हो

 

झूठी चमक-दमक

झूठे अहसास हीं हो

इंसानियत की हद में हो

 

ना सिर्फ़ इंकलाबों

बेतकल्लुफ़ी में भी पले

भीना जज़्बा ही रहे

जजमेंटल तो ना बने

सहनशील ही रहे

 

© स्वाति अग्रवाल सिंह, नोयडा

 

 

प्रेम की कई बात

 

प्रेम की कई बात

मैं और तूँ चले पात पात

स्नेह को तलाशती आँखें

प्रीत की आस में जागती रातें

फूलों के उपहार सजते

बिन महके ही बिखरते 

रिश्तों में ख़ुशियाँ ढूँढती

बहुत कुछ कहना है सोचती

एक जवान की प्रेमी

ज़िक्र कभी ना करना

पर फ़िक्र है ये बताना

मौन है कितने भाव यहाँ

स्वयं से प्रेम खो गया

देश प्रेम ही चाहत बन गया 

बाहरी इच्छाओं में बह गया

ख़ालीपन भी है पर

प्यार का अहसास

कम नहीं है यहाँ

बस प्रेम की बात

समझाना इतना

आसान नहीं यहाँ

रिश्तों में खामोशी

तस्वीरों में ख़ुशी

कितना छुपा लिया

अपना जज़्बात

अधूरे  हमारे अहसास

मन के बंजर धरा पर

कभी बरसे प्रेम सुधा 

कोई आज़माए नहीं

इनकार की गुंजाइश ना हो

इकरार का मौक़ा बेकार ना हो

बे वजह मुस्कुराने की बात हो

शिकवे गिले भी हो मगर

ज़िंदगी हर पल ख़ास हो जाए

हाथों में तेरा सम्पूर्ण साथ हो

क्या यही वैलेंटायन डे तो नहीं …??

 

© निशा राय, नोयडा

 

 

 

पुलवामा हमला

 

वह भारत के परमवीर महारथी थे।

वे शूर साहसी देश पर न्यौछावर कर गए अपनी जान थे।

 

वह पुलवामा का हमला कायराना था।

हमारे शूर वीरों को सामने से हराएं, शत्रु में इतना दम कहां था।

 

टकरा दिया क्रूर जालिम ने बारूद भरी गाड़ी को।

खुदा भी माफ नहीं करेगा ऐसे दो कौड़ी के जिहादी को।

 

उसने किया शुभ्र भारती पर प्रहार है।

भूल गया यहां का बच्चा-बच्चा बदला लेने को तैयार है।

 

हम भारतीयों की हुंकार व्योम हिला देगी।

पुलवामा के शहीदों की शहादत रंग ला देगी।

 

हर शूरवीर ,योद्धा,सैनिक पी चुका यह गरल खास है।

सावधान हो जाओ रिपु अब तुम्हारा अंत बहुत पास है।

 

गद्दारों हम आत्म दीप जलाकर ,वीरता की अमिट छाप छोड़ेंगे।

दो पैसे के गद्दारों को मिट्टी में मिला कर छोड़ेंगे।

 

सैनिक महारथी, सारथी है  भारत मां के।

यह राष्ट्र प्रेमी बलिदानी है इस धरती के।

 

घाटी में अमन चैन लाकर छोड़ेंगे।

जो भी नजर उठी घाटी पर उसे धूल चटा कर छोड़ेंगे।

 

© सुलेखा कुलश्रेष्ठ, बेंगलुरू

  

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