दोस्तों!
“शब्द सत्ता के शिल्पी” नामक व्हाटसएप समूह में होने वाली
कविता विनिमय विवरण आपके सामने प्रस्तुत है| इस बार के शिल्पी संवाद में “बसंत आगमन” विषय पर 30 जनवरी 2022 से 4 फरवरी 2022 के दौरान इस विषय पर पटल पर साझा की गई कविताओं की एक झलक
देखिए|
डॉ हिमांशु शेखर
बसंत आगमन विशेषांक
इस अंक के शब्द शिल्पी
सुरेन्द्र प्रजापति, गया
भरत सिंह सोलंकी, जयपुर
प्रेरणा पारिश, दिल्ली
प्राणेंद्र नाथ मिश्र, कोलकाता
मीनू वर्मा, नोयडा
अरूण कुमार दुबे, पटना
बिन्दु श्रीवास्तव, सुपौल
बसंत
होठों से फिसलती हुई मुस्कुराहट
बाँसुरी की स्वर लहरियों पर लौट
रही है
कल्पनाओं के निर्मल धुन पर
स्वप्नों की रेशमी डोर थामे
आह्लादित है हर दिशाएँ
थकान की पीड़ा गा रही है
चंचल हृदय की कामनाएं
हर सुख अल्हड़पन की मस्ती है
साध की ऊष्मा सुभाषित है
कोमल हुई है मौन की कठोरताएँ
हर तरफ उल्लास की बोली लगी है
पराग में भंवर की है, उतेजनाएं
नव जीवन के संचार में
उत्सव की लहरियों के व्यार में
नव प्राण का, नव उम्मीद की
यह अरुणाभ पहर में
सुगबुगा रही है संवेदनाए
ओ! गीत
नव लय में, मृदुल प्रणय में
धरा को सजाओ, क्षितिज को झुकाओ
शब्द के सारांश में है प्रेरणाएं
ओ मलय पवन! नई शुरुआत करो
इस मर्मर कानन में स्वर्ग धरो
स्वप्नों की राग में,
हुलस गया है विविध चित्र
ठहराव, से निकल
संगीतमय तार में
आकर्षण के व्यापार में
मुझे ले चलो! मुझे ले चलो!!
सुरेन्द्र प्रजापति, गया
बसन्त
हो रे गज़वन कैसा जुलम ढहाये रे
चमक चाँदनी चित चोरी कर कर इतराये
रे।
है रे खिली बसंत फूल रही सरसों मन
में खिली उमंग।
आसमान आलिंगन करता माँ धरती के
संग।
हो यौवन उड़ उड़ खाये रे
चमक चाँदनी चित चोरी कर कर इतराये
रे।
है रे लीची आम मोगरा फूले फूल रही
कचनार
फागुन देख यौवना फूली भूल गयी
घरबार।
बसंती रंग सताये रे
चमक चाँदनी चित चोरी कर कर इतराये
रे
है रे लाल ग़ुलाबी नीला पिला हरा
केसरी रंग
मीठी ठंड पवन में ख़ुशबू ओर फागुन
का संग
चकोरी चाँद चुराए रे।
चमक चांदनी चित चोरी कर कर इतरा
रही रे।
है रे फ़ूल फ़ूल को तितली चूमे कली
कली को भृमरा।
तितली मधु मकरंद चूसती चूमे तितली
भ्रमरा।
हो तितली मन भटकाये रे।
चमक चाँदनी चित चोरी कर कर इतराये
रे।।
है रे चौबारे मैं चढ़ कर ग़ज़बन ज़ुल्फ़
खड़ी लहराये।
नहन्नी नहन्नी उड़ें फुहारें मन मे
आग लगाये।
हो ग़ज़बन केस सुखाये रे।
चमक चाँदनी चित चोरी कर कर इतराये
रे।
भरत सिंह सोलंकी, जयपुर
कहते हो तुम आया वसंत है!!!
चहुँ ओर है धुंध की चादर
लगता नहीं हुआ पूस का अंत है
खुशगवार कहां हुआ है मौसम
कहते हो तुम आया वसंत है!!
हवा बर्फीली भेदे तन को
थरथर करती है हर एक जन को
धूप सुनहरी कहाँ है दिखती
कंपकंपाता दिखता जड़ चेतन
लगता नहीं हुआ पूस का अंत है
कहते हो तुम आया वसंत है!!
बदल गया धरती का आलम
गर्मी सर्दी बारिश, ज्यादा- कम
किसने की छेड़छाड़ है इनसे
बिगाड़ डाला सारा ही संतुलन
पृथ्वी के कोने कोने में
कहर बरपाये क्यों हर मौसम!
लगता नहीं पूस का हुआ अंत है
कहते हो तुम आया वसंत है!!
प्रेरणा पारिश, दिल्ली
आया बसंत,,,,मादक धरती:
अपलक निहारती क्षितिज पार
किस ओर उदित यह गीत हुआ
दिख नहीं रहा, फिर भी पिपासु
किस साथी का मन मीत हुआ ?
कुछ तो बोलो, नीले अंबर!
सतरंगी धनुष गगन पर क्यों?
क्यों हर्षित होती यह धरती
वन उपवन सारे मगन हैं क्यों?
बह रही बसंती मधुर पवन,
नयनों में फैली मादकता
चूमते पुष्प निर्भय होकर,
पेड़ों से लिपटी हुई लता।
संगीत बज रहा चार प्रहर,
उठ रही धूल अंगड़ाई ले
अंतर्मन में कोमल रुनझुन,
पायल यह किसने, बजाई रे!
नभ नील रंग की कोमलता,
लेकर निहारती है धरती,
खोजती श्याम को ज्यों राधा
वृंदावन बीच ठहरती।
मदमत्त नशे में है पलाश,
चलता चंदन का हाथ थाम
सीता को देख वाटिका में,
हों जैसे लक्ष्मण संग राम।
श्यामल स्वप्नों का गौर वर्ण,
पूनम में वंशी सुनाता है
कभी उत्तर से कभी पूरब से,
जाने किस दिशा से आता है!
पेड़ों से लिपटी हुई लता,
स्निग्ध पूर्णिमा मधुर रात,
मुस्कुरा रहे क्यों फूल बता,
करते क्यों प्रेयसी की ही बात?
रह रह के चूमती है मस्तक,
मादक सी पग की धूल है क्यों
बौराए आमों के मंजर,
प्रस्फुटित हो रहे फूल हैं क्यों?
कोकिला कूक करती छुप कर,
किसको सुना रही गीत, कहो!
यह कैसी मायावी ऋतु है ,
बोलो अदृश्य, मेरे मीत ! अहो!
आ गया है क्या ऋतुराज, कहो
खुल गए बसंती द्वार हैं, क्या?
नभ जल थल में प्रणय खेल,
रति कामदेव का प्यार है, क्या?
पहचाना था पहला बसंत,
अपनी तरुणाई में मैने
जब गंध पुष्प का कंठहार,
निरुद्देश्य बनाया था तुमने।
वह हार लिए मैं घूमा था,
हर वर्ष इसी ऋतु में, साथी!
जिसे पहन लिया था एक दिवस,
प्रेयसि! तुमने हे बासंती!
मुझे हार पुनः लौटा दो, हे!
खेलने दो मुझको प्रणय खेल,
आ रहे पुरुष इस सृष्टि के हैं,
होने दो प्रकृति और पुरुष मेल।
प्राणेंद्र नाथ मिश्र, कोलकाता
बसंत
देखो आया है बसंत,
मधुवन में सौन्दर्य है अनंत,
नव कली से धरा हुई है रम्य,
फूलों से आ रहा है सुगंध,
देखो आया है बसंत।
नभ पर घन का है आधिपत्य,
पवन बह रही है होकर मगन,
नदियों सागर से मिलने को...
कब से दिख रही है विकल,
देखो आया है बसंत।
धरा का लौटा है यौवन,
पंछियों की मधुर धुन से...
गूंज उठा है सारा उपवन,
देखो आया है बसंत।
भंवरे कर रहे हैं पुष्पों से...
मिलन की याचना अपार,
इन्द्र धनुष का दर्शन कर...
प्रसन्न है बच्चे बेशुमार
देखो आया है बसंत।
सरसों के खिल गये हैं षुष्प...
किरणों संग वे रहे हैं झूम,
नभ में सूरज है मगन,
प्रकोप ठंड का अब है खत्म,
देखो आया है बसंत।
झूमें पत्ते,कोयल गाए
रातों में जगमगाए तारें
सुहावना हो गया है मौसम,
देखो आया है बसंत।
रंग-बिरंगी तितलियों ने...
सुन्दरता है गजब की ढाई
खेतों में लगी फसलें सारी...
खुश होकर है इठलाई,
श्वेत सुगंधित मंजरी ने....
वसुधा की खुबसूरती है बढाई,
देखो आया है बसंत,
मधुबन में है सौन्दर्य अनंत।
मीनू वर्मा, नोयडा
याद तुम्हारी आई
मौसम आया.........
जब बहारों का,
पत्तों ने......
जब पाजेब बजाई,
मुझे याद तुम्हारी आई।
धानी चूनर.....
जब ओढ़कर धरती,
हौले से मुस्काई,
रिमझिम बरखा बरसी और...
जब पवनों ने ली अंगराई,
मुझे याद तुम्हारी आई।
कलियों ने खिलकर.....
सुगंध को अपनी,
जब चारो ओर बिखराई,
कोयल ने.........
जब मधुर तान सुनाई,
पीली सरसों पर.....
जब यौवन छाई,
मुझे याद तुम्हारी आई।
नभ में काली-काली घटा ने,
धूप संग.......
जब खेली आंख मिचौली,
तितलियां ने .........
जब स्पर्श कर पुष्पों का,
दर्ज प्रेम अपनी कराई...
मुझे याद तुम्हारी आई।
ऋतु बदले,
दिन बसंती जब आई,
आसमानों पर ......
जब इन्द्रधनुष लहराई,
मुझे याद तुम्हारी आई।
हरीतिमा ने........
जब प्रकृति की,
खुबसूरती अत्यधिक बढाई,
दिल ने........
जब गीत मिलन के,
प्यार से गुनगुनाई.......
मुझे याद तुम्हारी आई।
मीनू वर्मा, नोयडा
टूटे हुए तारो से, फूटे बसंती स्वर,
पत्थर की छाती में, उग आया नव अंकुर,
झरे सब पिले पत्ते, कोयल की कुहुक रात,
प्राची में अब अरुणिम की देख मैं
पाता हूँ,
एक गीत नया गाता हूँ||
आली रे आली ऋतुराज है आई,
चारो और बसंत बहार है छाई!!
कोयल की कुह कुह पहेली है भाग में,
धीमी धीमी सी ठण्ड है छाई,
नए पत्ते पेड़ो पे है आई. !!
देखो पेड़ो को,
कैसे यह सुहाना बनाए,
मौसम को मस्ताना बनाए !
हर दिल को है बसंत ऋतू भाती है!
इसलिए एक गीत नया गाता हूँ !!
सीधी है भाषा, प्रेम की अभिलाषा
वसंत को कभी आँख ने समझी,
कभी कान ने पोई,
कभी रोम-रोम से प्राणों में यह भर
आई,
नील आकाश में, नई ज्योति छा गई !
कब से प्रतीक्षा थी, वही बात आ गई!
लो वसंत ऋतू आ गयी !!
ऋतुओ का राजा, सबको है भाता,
सुन्दर यह पर्यावरण बनता |
हर दिल को है यह लुभाता,
चिड़ाओ को चेहचाता |
फसलों को लहराता,
सुन्दर सा माहोल बनता,
हर दिल को है यह भाता,
इसलिए तो वसंत ऋतू,
ऋतुओ का राजा कहलाता ||
अरूण कुमार दुबे, पटना
कहलाओगे बसंत तब ही मनमोहना
ख़ूब खिली है पीली सरसों
दिखते मलिन मुख भी सहस्त्रों,
कोयल की तान के संग संग
ये भूख से कौन बिलखता है ?
उमंग में मस्त बलखाए गोरी
उधर कोई खनकाए कटोरी
आड़ में कोकिल की कूकों की
ये कौन छुपकर सिसकता है ?
हाथों में मेंहदी दम दम दमके
सुहाग बिंदिया चम चम चमके
प्रतीक्षा की घड़ियाँ होती ना कम
श्रृंगार फीके , विह्वल मन
सजन किसका तन्हा ही
कर्त्तव्य पथ पर आगे बढ़ता है ?
मादक, मोहक, मनभावन तुम हो
हर्षोल्लास का आलम तुम हो
फिर ये क्यों छाया विषाद है!
धूमिल क्यों खुशियों का चिराग़ है?
विरहन की कहीं अंखियाँ प्यासी
कहीं भूख,प्रतीक्षा,दुःख और उदासी
आओ जो
अबकी सब हरना
कहलाओगे बसंत तब ही मनमोहना ।
प्रेरणा पारिश, दिल्ली
रुत बसंत है
रुत बसंत है
पुलकित दिग दिगंत है,
तरंगित कण कण है
छाई नव
उमंग है,
कोयल की कूक है
उठती दिल में हूक है,
मस्तानी पवन है
मन मस्त मलंग है,
सरसों है
पीली
फिज़ा भी
रंगीली,
भँवरों का
गुंजन
आशिक़ाना मौसम,
कलियों पर निखार है
आई बहार
है,
ऐसे में कैसे
और किसको
प्यार ना हो !
नशीला समां है
उमर तो है संख्या
हर दिल जवाँ है।
प्रेरणा पारिश, दिल्ली
पंचमी
तिथि वसंत पंचमी,
अहं ब्रह्मस्वरूपणी,
रूप है सरस्वती ,
आ रही है पंचमी
आ रही है
भारती---2
सद्ज्ञान, सदविचार----
सदवृती ,संस्कार
स से स्वर दे----
निखारती है भारती ।
आ रही है भारती---3।
रचना में
भावभर,
शब्द से
निखारकर,
र से रसना पे
हो सवार ,
भाँति-भाँति लय को ;
उच्चारती है भारती ।
आ रही है-----।
स्व से स्वास्ति वाचन
देवो का आशीष
भर
शुभ
यज्ञ,कर्म को
संभालती है भारती ।
आ रही है------
ती से
तीक्ष्ण बुद्धि से,
मानव को प्रेरित
कर
धरा से
गगन के रहस्य
को भी प्रसारती ।
आ रही है---
सूर्य
अब प्रखर हुआ ।
वसुंधरा संवर गई ।
पुष्प दल बिखर गय ।
सिहर- सिहर हवा चली ।
आ रही है---।
सेवरी दर्शन
से खिली;
बजी कृष्ण की बाँसुरी,
समर सिमटी, गौरी चौहान की ।
कहतें हैं -- - वह यही
तिथि ।
आ रही है भारती ।
आ रही है पंचमी
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